आखरी साँस तक लड़ेंगे !

पूरी दुनिया में जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई बहुत बड़े स्तर पर पूंजीपति वर्ग के खिलाफ़ लड़ी जा रही है| चाहे फिर वो विकासशील देशो की फेहरिस्त हो या फिर विकसित देशो की, हर जगह विकास के झूठे मुखोटे को ओढ़कर पूंजीपति इस घिनोने स्वांग को रच रहा है| और यह सब किया जा रहा है सबसे शक्तिशाली बनने को हौड में, अगर आप यह सोचते है की सिर्फ़ कुछ देश ही इस रेस में दौड़ रहे है तो आप गलत है| सिर्फ देश ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े पूंजीपति और औधोगिक घराने विनाश की इस अंधी दौड़ का हिस्सा है|

आज शक्तिशाली बनने के लिए सबसे जरुरी है की आपके पास असीमित हथियारों का जखीरा हो| और उन्ही हथियारों के निर्माण के लिए पूरी दुनिया में धरती के गर्भ को चीरा जा रहा है, लाखों आदिवासियो, ग्रामीणों को बेघर किया जा रहा है| जिन देशो में इस तरह की विस्थापन परियोजनाएं चलायी जा रही है उनमे शामिल है गिनी, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीकी देश, जमैका, ब्राज़ील, वियतनाम, भारत और भी न जाने कितने? पिछले 60 वर्षों में भारत में औद्योगीकरण की वजह से लगभग 6 करोड़ लोग पहले से ही विस्थापित हो चुके हैं। जिनमें से लगभग 20 लाख वंचित लोग उड़ीसा में रहते हैं और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 75 प्रतिशत लोग आदिवासी या दलित हैं।

हक़ की इस लड़ाई में आम ग्रामीण और आदिवासी आदमी अपनी जान की परवाह न करते हुये सरकार, पुलिस, पूंजीपतियों के गुंडों और भारतीय फोज़ की अमानवीय बर्बरता का शिकार हमेशा होता रहा है|

कुछ ऐसे ही आदिवासी ओड़िशा की नियमगिरि पर्वतमाला में है, जो पिछले 11 वर्षो से अपने ऊपर विकास के नाम पर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर रहे है| दरअसल ओड़िशा के जिला रायगढा और कालाहांडी के मध्य स्थित है नियमगिरि पर्वत श्रंखला जहाँ उड़ीसा का सबसे अधिक विवादास्पद और बहुमूल्य बॉक्साइट भंडार है| जबकि इसके आस-पास के जिलो जैसे खण्डधरा और क्योंझर के जंगलो में स्थित पहाड़ो में अत्याधिक मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध है।

दरअसल आज जब पूरी दुनिया विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ी है तब हमे समझ आता है की अमेरिका के साथ कई बड़े-बड़े औधोगिक घराने भी है जो हथियारों का व्यापार कर वर्तमान में अपनी एक अलग पहचान बनाने की हरसंभव कोशिश कर रहे है| इस पहचान को अंजाम तक पहुचने में उनके सहायक है पूरी दुनिया में फैले बॉक्साइट और इसी तरह के खनिजों से लबालब भरे पहाड़ और धरती| बॉक्साइट के शोधन परिक्रिया के बाद निर्माण होता है एल्युमिनियम का जिससे बनती है मिसाइलों, बम, लड़ाकू हवाई जहाज़ और भी न जाने क्या-क्या ?

एल्युमिनियम का युद्ध से सम्बन्ध उसके पहले संरक्षकों-फ्रांस के नेपोलियन तृतीय और जर्मनी के कैसर विल्हेम तक जाता है। एल्युमिनियम के विस्फोटक गुण का आविष्कार 1901 में हुआ था जब अमोनल और थर्माइट को खोज निकाला गया था। उसके बाद इस धातु ने दुनिया के इतिहास की धारा ही बदल दी।

पहले विश्व युद्ध के दौरान ही एल्युमिनियम कम्पनियों को यह आभास हो गया था कि उनका भविष्य हथियारों और विस्फोटकों के निर्माण के साथ जुड़ा हुआ है। 1930 के आस-पास हवाई जहाज़ों के डिज़ाइन में एल्युमिनियम का उपयोग होना शुरू हो गया और जैसे ही जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका ने हज़ारों की संख्या में लड़ाकू जहाज़ों का निर्माण करना शुरू किया, एल्युमिनियम कम्पनियों ने बेहिसाब पैसा बनाया। एल्युमिनियम अब भी एक खाली जम्बो जेट तथा दूसरे हवाई जहाज़ों के पूरे वजन का 80 प्रतिशत होता है जिसमें इसे प्लास्टिक के साथ भी यौगिक बना कर इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरे विश्व युद्ध में एल्युमिनियम का उपयोग, मुख्य रूप से नापाम बम समेत, बमों में पलीता लगाने के लिए किया जाता था जिसकी वजह से हवाई हमलों में जर्मनी और जापान में हज़ारों नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। वास्तव में युद्ध सम्बन्धी धातुओं के निर्माण में जो भी खनिज लगते हैं वे सब के सब उड़ीसा में पाये जाते हैं- लोहा, क्रोमाइट, मैंगनीज; इस्पात के लिए, बॉक्साइट तथा यूरेनियम, सब कुछ।

हिटलर को उड़ीसा के बॉक्साइट खनिज की जानकारी थी और यह एक वजह थी जो उड़ीसा के बन्दरगाहों पर जापान ने बम गिराये थे। अमेरिका में विशालकाय बांधों के निर्माण के पीछे मुख्य कारण एल्युमिनियम स्मेल्टर्स के लिए बिजली की आपूर्ति करना था। ’पश्चिमी बांधों से पैदा होने वाली बिजली के कारण दूसरा विश्व युद्ध जीतने में मदद मिली थी’ क्योंकि इससे एल्युमिनियम बनाने में मदद मिलती थी जिसका उपयोग हथियारों और हवाई जहाज़ों में होता था।

युद्ध के बाद एल्युमिनियम से होने वाली आमदनी धराशायी हो गई लेकिन इसमें फिर उछाल आया जब कोरिया में युद्ध शुरू हुआ, उसके बाद वियतनाम और फिर कितने ही युद्ध अमेरिका के उकसाने पर हुए। भारी मात्रा में एल्युमिनियम के उपयोग और उसको नष्ट किये बिना आज न तो कोई युद्ध सम्भव है और न ही उसे सफलतापूर्वक उसके अंजाम तक पहुँचाया जा सकता है| एल्युमिनियम युद्ध में सुरक्षा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, इसकी मदद से लड़ाकू और परिवहन के लिए जहाज़ों का निर्माण होता है। ईराक या अफ़गानिस्तान में दागी जाने वाली हर अमरीकी मिसाइल में विस्फुरण प्रक्रिया में शेल के खोखों और धमाकों में एल्युमिनियम का इस्तेमाल होता है।

दोनों विश्व युद्धों के बीच परदे के पीछे से युद्ध को उकसाने में हथियार बनाने वाली कम्पनियों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।

वापस लोटते है नियमगिरि जहाँ लंदन मूल की खनन कंपनी वेदांत से बॉक्साइट के इन पहाड़ो को बचाने के लिए वहाँ रहने वाले आदिवासी जिन्हें डोंगरिया कोंध कहा जाता है पिछले कई वर्षो से लड़ रहे है| और इस लड़ाई में वेदांत का साथ दे रही है राज्य सरकार, प्रशासन और पैसों के बल पर ख़रीदे गए कुछ गुंडे|

आये दिन ये सभी लोग मिलकर कभी डोंगरिया कोंध को कुछ पैसा लेकर, नियमगिरि छोड़ कर चले जाने का दबाव बनाते है तो कभी इस आन्दोलन के सबसे प्रमुख आदिवासी नेता लोधा सिकोका को गायब कर उसकी अमानवीय बर्बरता से पिटाई कर, तो कभी मओवादियो की तलाश के नाम पर पूरे गॉव को परेशान कर इस आन्दोलन को कमज़ोर करने की हर संभव कोशिश करते रहते है|

वर्ष 2013 के अप्रेल माह में सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा सरकार को एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। जिसके तहत वह जिला रायगढा और कालाहांडी के मध्य स्थित नियमगिरि पर्वत श्रंखला में जाकर वहाँ बसे डोंगरिया कोंध की खनन को लेकर राय जाने एवं ग्राम सभाएँ करायें। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद कई राष्ट्रीय एवं अंर्तराष्ट्रीय संघठनो व मीडिया की नज़रे 18 जुलाई से 19 अगस्त तक चलने वाली 12 ग्राम सभाओ पर टिकी रही। जहाँ 30 किमी क्षेत्र में फैले नियमगिरि का भविष्य उसमे रहने वाले लोगो के हाथो में था। एक माह चले इस कार्यक्रम में काफ़ी कुछ लोकतांत्रिक देखने को मिला तो काफ़ी कुछ ऐसा भी था जो प्रशासन और सरकार की तानाशाही को बयान करता था|

प्रकति की गोद में डोंगरिया कोंध

नियमगिरि की विशाल पर्वत श्रंखला दो जिलो रायगढा और कालाहांडी के बीच में पड़ती है| जिनमे डोंगरिया कोंध (पहाड़ो पर बसे होने के कारण नाम डोंगरिया कोंध) की 10,000 की आबादी 112 गॉवो में बसी है| मिटटी, लकड़ी और बांस की मदद से बने घरो में ये लोग पहाड़ो पर डोंगर (खेती) कर प्रकति की गोद में अपना जीवन जीते है|
image

बारिश के मौसम में ग्राम सभा के बहाने मुझे नियमगिरि जाने का मोका मिला| जहाँ बॉक्साइट के लाल पहाड़ो, नीले रंग के आसमान के बीच चारो और फैले जंगलो का मनोरम नज़ारा हमेशा के लिए मेरी नज़रो में कैद हो गया|

लगातार होती बारिश की बूंदे जब चारो और फैली वनस्पतियों और पेड़ो के जरिये होती हुई वहाँ की लाल मिटटी में समाती थी, तो उस वातावरण में साँस लेने पर महसूस होता की इंसान जीने के लिए साँस भी लेता है| शहर के प्रदूषण और हज़ारों बीमारियों से कोसो दूर नियमगिरि के पहाड़ो को बीच से काटता हुआ झरने का पानी पत्थरो की मार खाकर और भी शुद्ध होता हुआ अपनी तेज़ रफ़्तार में बहा जा रहा था।

एक साथी से मालूम हुआ की नियमगिरि से वंसधारा(210 किमी) और नागावाली(200 किमी) नाम की दो बड़ी नदिया आंध्रप्रदेश होते हुए दो राज्यों की जरूरतों को पूरा कर बंगाल की खाड़ी में जा समाती है। यहाँ से 35 झरने भी निकलते है जो डोंगरिया कोंध की जरूरतों को पूरा कर नीचे बसे गॉवो तक जाते है।

हज़ारों वनस्पतियो और विशालकाय पेड़ो से भरे ये जंगली पहाड़ जितने खुबसूरत है उससे कही ज्यादा महत्वपूर्ण है। कई बीमारियों की प्रतिरोधक जड़ी-बूटिया और बहुमूल्य वनस्पतियाँ यहाँ भारी मात्रा में उपस्थित हैं। उसके आलावा यहाँ फल सब्जी और कंद-मूल का असंख्य भंडार है। जैसे अनानास, नींबू, केला, संतरा, कटहल, हल्दी, अदरक, कोसला, कांगू, कटी, कांदू, अलसी, महुआ के फूल, कुसुम, नीम और भी न जाने क्या-क्या? पेड़ और फल-फूल के अलावा यहाँ बाघ, तेंदुआ, सांभर, हिरण, हाथी, सांप, जंगली सुअर और कई तरह के पशु-पक्षी मोजूद है। इसके साथ-साथ नियमगिरि के हर गॉव में मुर्गी, बिल्ली, बकरी, कुत्ते, गाय, भेस जैसे जानवरों का पशुपालन इनके जीवन का एक हिस्सा है|

डोंगरिया कोंध की इस आबादी में पुरुष और महिलाओ का पहनावा बहुत सुन्दर है। महिलाएं अपने लम्बे बालो को असंख्य चिमटियो से संभाले उन्हें रंग-बिरंगे फूलो से सजाये और उनमे चाकू फंसाकर चहरे पर एक मध्यम मुस्कान लिए हमेशा दिखायी देती है तो दूसरी तरफ पुरुष भी कई तरह के श्रंगार के साथ हाथ में हमेशा एक कुल्हाड़ी लिए नियमगिरि की सुरक्षा करते पूरी पर्वतमाला में कही भी दिखाई दे सकते है।

डोंगरिया लोग जंगल के नियम और कानूनों के हिसाब से चलते है एवं प्रकति के नियमो को ध्यान में रख कर हर काम करते है। जैसे हर डोंगरिया व्यक्ति खेती करने के लिए 3 पहाड़ो की

नियमित ज़मीन को चुनता है। पहले 3 वर्ष वह एक पहाड़ पर खेती करता है उसके बाद दुसरे और अंत में तीसरे पर, इस तरह वह 6 वर्ष तक हर एक पहाड़ को अपनी उर्वक शक्ति बढ़ाने के लिए खाली छोड़ देता है।

इस 30 किमी लम्बी पर्वत श्रंखला में हर कोई नियम से चलता है इसी कारण इस जगह को नियमगिरि और यहाँ का देवता नियमराजा को माना जाता है। जो असल में और कोई नहीं बल्कि प्रकति ही है। डोंगरिया कोंध उन सभी पहाड़ो पर अपने नियमराजा का आवास मानते है जो नियमगिरि पर्वत श्रंखला में आते है। ये लोग अपनी नई पीढ़ी को भी प्राकर्तिक नियमो से चलना, सही जड़ी-बूटियों की पहचान करना सिखाते है। साथ ही महिलाओ को जीवनसाथी चुनने और कंधे से कंधा मिलाकर चलने की पूर्ण आज़ादी देते है।

डोंगरिया, डोम, कुटिया कोंध के साथ नियमगिरि के चारो तरफ़ फैले मुनिगुडा, लांजीगढ़, भीष्मकटक जैसे छोटे-छोटे शहरों की कुल आबादी को अगर जोड़ा जाये तो दो लाख के आस-पास बैठती है। ये पूरी आबादी नियमगिरि से मिलने वाले फल, कंद-मूल और वनस्पतियों पर पूर्ण रूप से निर्भर है।

लेकिन इन पहाड़ो और प्रकति की सुन्दरता को निहारते हुए जीना जितना खुशनुमा है उतना ही मुश्किल भरा भी। पिछले 1.5 दशक से देश और विदेश की कई बड़ी-बड़ी खनन कम्पनियाँ बॉक्साइट के इन पहाड़ो का खनन करने की हर संभव कोशिश कर रही है।  बिडला और नाल्को तो यहाँ पिछले एक दशक के पहले से मोजूद है। लंदन मूल के अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांत ने 2002 में यहाँ का रुख किया। ओडिशा सरकार ने यहाँ उसका हर कदम पर साथ दिया ए.राजा के पर्यावरण और वन मंत्रालय में कार्यकाल के दौरान वेदांत ने ओड़िशा सरकार के साथ मिलकर नियमगिरि में खनन करने और लान्जिगढ़ में प्लांट लगाने को लेकर एम.ओ.यू.पर हस्ताक्षर किये।

विकास की ये कैसी चाल

पूरी दुनिया में बिना किसी भारी निवेश के आप कैसे अरबपति बन सकते है अगर ये सीखना है तो इसका सबसे बड़ा उदहारण है, अप्रवासी भारतीय अनिल अग्रवाल (जन्म 1954)| ये लंदन में बैठ कर भारत के गुजरात, पश्चिम बंगाल, गोवा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, राजस्थान और ओड़िशा के साथ साथ पूरी दुनिया में ऑस्ट्रेलिया, लिबेरिया, साउथ अफ्रीका, आयरलेंड, नमेबिया, जेमबिया जैसे देशो में धातु और तेल की एक चेन पर नियंत्रण करते है| अनिल अग्रवाल ने मोरिशस में टेक्स से बचने के लिए ‘वल्कन’ नाम से एक कंपनी शुरू की जिसके बाद कई देशी-विदेशी, सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों को कम दामो में ख़रीदकर अपने धातु के साम्राज्य को पूरी दुनिया में फ़ैलाने की हर संभव कोशिश की है| अपने इसी व्यवसाय के कारण ये भारत के सबसे अमीर कारोबारियों की सूची में 12 वे नंबर और दुनिया में 154 वे नंबर तक आ पहुँचे है| अपने 38 वर्ष लम्बे इस इतिहास में इन्होने पैसे के बल पर लाखो लोगो को बेघर किया, उनकी ज़मीन छीन उन्हें दर-दर की ठोकरे खाकर मरने को मजबूर किया| स्टरलाइट, वेदांत, वल्कन, मालको, बाल्को, एच.जेड.एल. और भी न जाने भारत और पूरी दुनिया में कितने नामो से मशहूर अनिल अग्रवाल का साम्राज्य जितना विशाल है उतना ही दिलचस्प भी
image

– 15 वर्ष की उम्र में अनिल अग्रवाल ने स्कूल छोड़ अपने परिवार के व्यवसाय को संभाला और व्यवसाय की बारीकियों को समझा|

– महज़ 21 साल की उम्र में वर्ष 1975 में उसने‘रैनबो इन्वेस्टमेंट लिमिटेड’ नाम की एक कंपनी स्थापित की, जिसका उसी वर्ष नाम बदलकर ‘स्टरलाइट केबलस’ कर दिया|

– वर्ष 1976 में उसने सिंडिकेट बैंक से 60 लाख का लोंन लेकर नेपाल के राजा से मुंबई के घाटकोपर पर स्थित ‘शमशेर स्टरलिंग कॉर्पोरेशन’ नाम की कंपनी ख़रीदी| जिसमे उसने सोची समझी चाल के मुताबिक राजा के सबसे विश्वासपात्र आदमी हरिहरनाथ मिश्रा को अपने साथ मिलाकर कंपनी की क़ीमत बहुत कम आंकी| जबकि उस क़ीमत में कंपनी के गोदाम में पडा लाखों रूपये का कॉपर तो नज़रंदाज़ ही कर दिया गया|

– अनिल अग्रवाल ने अगले 2 हफ़्ते में ही कंपनी से सारा कॉपर निकालकर बेच दिया और बैंक का लोन भी अदा कर दिया| और ये सभी कोई सयोंगवश नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति के मुताबिक किया गया|

– वर्ष 1986 में स्टरलाइट केबलस ने अनिल अग्रवाल से शमशेर स्टरलिंग कॉर्पोरेशन को ख़रीद लिया और उसका नाम ‘स्टरलाइट इंडस्ट्री’ पडा|

– वर्ष 1988 में स्टरलाइट इंडस्ट्री में टेलीफ़ोन के तार बनाने का कम शुरू किया गया| इसी वर्ष स्टरलाइट संदेहात्मक रिकोर्ड़ो के बावजूद ‘बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज’ की सूची में शामिल हुआ |

– वर्ष 1992 में स्टरलाइट कम्युनिकेशन ओरंगाबाद पंहुचा जिसके बाद उसने हरिद्वार और दादरा में भी अपने पैर जमाये|

– वर्ष 1993 में उसने ‘टूटीकोरियन’ (तमिलनाडु) में एक स्मेल्टर प्लांट शुरू किया|

– वर्ष 1995 में ‘मालको’ का 80% हिस्सा हासिल कर दक्षिण भारत के एल्युमिनियम निर्माताओ में शामिल हुआ| साथ ही एल्युमिनियम निर्माण में स्टरलाइट को और विकसित किया|

– वर्ष 1998 सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इडिया [SEBI] द्वारा स्टरलाइट सांकेतिक हुआ|

– वर्ष 1999 में टूटीकोरियन प्लांट को केंद्रित रख इसने ‘तस्मानिया कॉपर माइन’ और ‘थालंगा कॉपर माइन’ को हासिल कर लिया|

– वर्ष 2000 में अनिल अग्रवाल, दूरसंचार के साथ एक टेलिकॉम कॉन्ट्रेक्ट के संदिग्ध सोदे में दोषी पाये गये|

– वर्ष 2001 में भारत सरकार से ‘बाल्को’ का 51% हिस्सा हासिल कर केन्द्रीय भारत के एल्युमिनियम निर्माताओ में शामिल हुआ|

–  सेबी ने अगले दो वर्षो तक स्टरलाइट की कैपिटल मार्केट में शामिल होने से रोक लगा दी|

– वर्ष 2002 में भारत सरकार से ‘एच.जेड.एल.’ का 26% हिस्सा जिंक और लेड के निर्माण में हासिल किया, और अगे चालकर 20% खुले बाज़ार से|

– वर्ष 2003 में विकल्प के तौर पर एच.जेड.एल. का 19% हिस्सा और हासिल किया| लगभग 66% हिस्सा अब उसके पास था|

‘एंगेलचेंज लिमिटेड’ नाम की कंपनी इंग्लैंड में रजिस्टर की|

– एंगेलचेंज लिमिटेड का नाम बदलकर ‘वेदांत रिसोर्सेज होंडलिंग्स लिमिटेड’ रखा|

फ़रवरी से दिसंबर 2003 के मध्य वेदांत के शेयरों के दाम 1000 गुना के उछाल तक आये जिस पर न तो कोई तहकीकात हुई और न ही कोई कार्यवाही|

– वेदांत ‘लंदन स्टॉक एक्सचेंज’ में गया और भारत के सभी राजनेतिक और अन्य महत्वपूर्ण आदमियों को अपने बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल कर लिया| फिर चाहे वो यू.पी.ए. से हो या एन.डी.ए. से या फिर कोई रिटायर्ड आई.पी.एस. अधिकारी ही क्यों न हो|

– वर्ष 2004 में ‘कोंकोला कॉपर माइंस, ज़ाम्बिया’ में 51% हिस्सा हासिल कर ज़ाम्बिया कॉपर पट्टी में सबसे बड़ा कॉपर निर्माता बना|

– भारत सरकार के बाल्को में बचे हिस्से को ख़रीदने के लिए आवेदन दिया|

– वेदांत द्वारा बाल्को 551 करोड़ में ख़रीद ली गयी जबकि उसका असल मूल्य 3000 करोड़

रूपये था|

प्रणब मुखर्जी ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय का पद संभालने से पहले वेदांत बोर्ड के नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के पद से इस्तीफा दिया|

– भारत सरकार द्वारा बाल्को में अपने बचे हुए हिस्सों को बेचने पर इंडिया अटॉर्नी जनरल द्वारा विरोध|

– भारतीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने वेदांत से आपसी रिश्तो के कारण नाल्को में 10% हिस्से के विनिवेश का निर्णय लिया|

– कुछ लोगो द्वारा हंगामा करने पर इस पेचीदा रूचि पर जाँच भी बिठाई गयी|

– वेदांत द्वारा ओड़िशा में एक यूनिवर्सिटी खोलने एवं 15 हज़ार करोड़ का फण्ड देने का निश्चय| इस परियोजना में कोणार्क-पुरी मरीन ड्राइव की लगभग 10,000 एकड़ ज़मीन का ज़बरदस्ती अधिग्रहण तय था| इस परियोजना जिसका निर्माण, अनिल अग्रवाल ने अपने खुद के नाम यानि अनिल अग्रवाल फाउंडेशन के द्वारा करना तय किया|

अनिल अग्रवाल के इस धातु [सोने, बॉक्साइट, कॉपर, लेड, सिल्वर] और तेल के साम्राज्य में अगर किसी का सबसे ज्यादा हिस्सा है तो वो है उसका परिवार –

group-chart

–          56% – वेदांत रिसोर्सेज पी.एल.सी. में,

–          88% – स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड,

–          51% – भारत एल्युमीनियम लिमिटेड इंडिया,

–          76% हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड इंडिया,

–          51% कोंकोला माइनिंग ज़ाम्बिया और ऑस्ट्रेलिया के ऐसे कई माइनिंग कारखानों में,

–          100% स्टरलाइट गोल्ड अर्मेनिआ – टोरंटो स्टॉक एक्सचेंज की सूची में भी शामिल,

–          100% स्टरलाइट ऑप्टिकलस इंडिया|

 

वेदांत इन सभी के बीच कुछ ऐसे भी कार्यक्रम भी करता रहा है जिससे वह भारत के शहरी वर्ग में अपनी छवि को साफ सुथरा दिखा सके जैसे

– वेदांत ने भारत की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी ओ.एन.एम. से एक विज्ञापन बनवाया जिसमे उसने बिन्नो नाम की एक लड़की की मदद किये जाने का झूठा सच दर्शको तक पहुँचाया| और नाम दिया गया क्रिएटिंग हैप्पीनेस|

– इसके साथ-साथ वेदांत ने देश भर के सभी मीडिया संस्थानों और अन्य शिक्षण संस्थानों में विकास के ऊपर एक दस्तावेजी फ़िल्म बनाने की प्रतियोगिता रखी जिसमे छात्रों को उसी की कंपनी के ऊपर फिल्म का निर्माण करना था| इस प्रतियोगिता को जज करने के लिए श्याम बेनेगल, गुलपनाग और पीयूष पाण्डेय तय किये गये| कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओ द्वारा सवाल-तलब होने पर श्याम बेनेगल और गुल पनाग ने इस कार्यक्रम से अपने आप को अलग कर लिया|

– गोवा फ़िल्म महोत्सव में भी उसके आयोजको ने वेदांत से पैसा लेकर श्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म के नाम से एक अवार्ड की शुरुआत की, जिसके बाद देश भर से लगभग 100 फ़िल्मकारो, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओ द्वारा आयोजको को इसके खिलाफ एक चिठ्ठी लिखी गयी| मजबूरन आयोजको द्वारा वेदांत को अपने इस फ़िल्मोत्सव से अलग करना पड़ा|

– कोणार्क-पुरी मरीन ड्राइव की लगभग 10,000 एकड़ ज़मीन पर एक यूनिवर्सिटी बनाने के लिए अनिल अग्रवाल फाउंडेशन द्वारा 15 हज़ार करोड़ रूपये का फण्ड देने के पीछे वेदांत का उद्देश्य कोई समाज सेवा करना नहीं था| बल्कि ओड़िशा सरकार के साथ एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर करते समय वेदांत ने अपनी कुछ शर्ते साफ कर दी जैसे

  • यूनिवर्सिटी से एअरपोर्ट तक एक 100 किमी. लम्बे हाईवे का निर्माण|
  • यूनिवर्सिटी में एक रेलवे स्टेशन का निर्माण|
  • पुरी शहर की बिजली आपूर्ति का 10 गुना ज्यादा यूनिवर्सिटी में व्यय तय|

इस सभी के साथ 10 हज़ार एकड़ इस उपजाऊ ज़मीन, नुवानोई नाम की नदी का अधिग्रहण कर, और हज़ारों लोगो को विस्थापित कर वेदांत यहाँ गोल्फ़ कोर्स, पांच सितारा होटल, मिनी स्टेडियम, हवाई पट्टी और भी न जाने क्या-क्या बनाने की चाह रख रहा था|

इस परियोजना से प्रभावित होने वाले लोग ओड़िशा न्यायालय तक गये और निम्नलिखित बाते रखी| –

  • इससे सी.आर.जेड़.[कोस्टल रेगुलेटरी ज़ोन] प्रभावित हो रहा है|
  • इस परियोजना से हज़ारों लोग बेघर हो रहे है|
  • अनिल अग्रवाल फाउंडेशन के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में शामिल अनिल अग्रवाल के पिता की   मृत्यु इसके निर्माण से काफ़ी समय पहले हो चुकी है|

बॉक्साइट को एल्युमिना और उसके बाद एल्युमिनियम में बदलने की परिक्रिया दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फ़ैलाने की परिक्रियाओ में से एक है| वेदांत के द्वारा खनिज पदार्थो के इन रिफाइनरी प्लांटो से देश और दुनिया के कई स्थान प्रभावित हो रहे है| जैसे

– गोवा के सीसागोवा आइरनोड़ प्लांट के कारण वहाँ काफ़ी प्रदूषण फ़ैल रहा है|

– तमिलनाडु में स्टरलाइट की कॉपर की फैक्टरी है जिसके द्वारा निकलने वाले प्रदूषण का लोगो द्वारा काफ़ी जोर-दार विरोध भी किया गया|

– छत्तीसगढ़ के कोरबा में बाल्को की निर्माणधीन चिमनी अचानक से गिर पड़ी जिसमे कई मजदूरों को अपनी जान से हाथ धोना पडा|

– स्टरलाइट का अपने कर्मचारियों के साथ बर्ताव भी कुछ ज्यादा ठीक नहीं है| एक बार उसने 300 लड़के-लडकियों को अपने यहाँ ट्रेनिंग पर रखा और ट्रेनिंग ख़त्म होने के बाद उसने उन्हें स्थायी रूप में रखने से साफ इंकार कर दिया| कर्मचारियों के विरोध करने पर 118 लोगो को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया जिनमे 8 लडकियाँ भी शामिल थी|

– दामनजोड़ी में नाल्को और कोल्बा में बाल्को का प्लांट लगने के बाद से ही वहाँ के हालत काफ़ी ख़राब है|

– जंगल काटे जा रहे है जिस कारण बारिश भी रुक गयी है| दामनजोड़ी में तो कांट्रेक्टरो और ट्रांसपोर्टरों की बढती आबादी के ही कारण उस आदिवासी इलाके मे लगभग 800 महिलायें देह व्यापार में लग गयी है|

– अफ्रीका [ब्लैक माउंटेन माइनिंग] में भी माइनिंग ऑपरेशन के कारण यही हाल है|

विकसित देशो की अगर फेहरिस्त देखी जाये तो कोई भी देश बॉक्साइट को रिफाइन नहीं करता है| जबकि ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, चीन, ग्रीस, गिनी, गुयाना, भारत, जमैका, कज़ाकिस्तान, रूस, सूरीनाम, वेनेज़ुएला, जैसे विकासशील देश इसके निर्माण में लगे हुए है| और चोकाने वाली बात ये है की स्लोवेनिया, कुवैत, नेपाल, इटली, क़तर, ओमान जैसे देश जहाँ बॉक्साइट का नामोनिशान तक नहीं है वो देश इसका निर्यात कर रहे है|

भारत मे पब्लिक सैक्टर के पास 18 माइनस है जिसका भंडार 5723663 टन है| एवं मूल्य 1133189 हज़ार रूपये है| और इसके उलट प्राइवेट सैक्टर के पास 171 माइनस है जिसका भंडार 6917122 एवं मूल्य 3604291 हज़ार रूपये है|

 

नियमगिरि का सच

   भारत की सबसे बड़ी बॉक्साइट खदान पंचपाट माली में है जो नाल्को के अधीन है। यहाँ देश की 7 चालू रिफाइनरियों में से दो मौजूद हैं, पहली नाल्को की दामनजुड़ी में और दूसरी कुछ समय पहले पूरी की गई वेदान्त की लान्जीगढ़ में। इसके साथ देश के 6 स्मेल्टरों में से 2 स्मेल्टर, एक नाल्को का अनगुल में और दूसरा इन्डल का हीराकुड में, यहीं चालू हैं। बहुत सी नई परियोजनाएँ भी आने वाली हैं जैसे उत्कल की एक रिफाइनरी का काम काशीपुर में चल रहा है। कुछ दूसरे स्मेल्टर्स की भी योजना है जिसमें से वेदान्त का एक कारखाना झारसुगुड़ा जिले में निर्माणाधीन है और दूसरा सम्बलपुर जिले में हिन्डाल्को के अधीन योजना के अन्तिम दौर में है।

11 वर्ष पहले वेदांत नियमगिरि में आया चूँकि विश्वभर के सबसे अच्छे बॉक्साइट के पहाड़ यहाँ स्थित है| अगर ओड़िशा के सारे बॉक्साइट का मूल्यांकन किया जाये तो हम पाते है की पूरे भारत में सभी प्रकार के खनिजों में बॉक्साइट की मात्रा लगभग 3.4% है जिसमे से उसका 1.8% ओड़िशा में ही है| ओड़िशा में इसके अलावा देश भर का 24% कोयला, 17% आइरनोड़, 35% मेंग्नीज़, 98% क्रोमाइड और 51% बॉक्साइट है| केवल ओड़िशा के बॉक्साइट का मूल्य दो ट्रिलियन डॉलर्स याने भारतीय जी.डी.पी. का दो गुना है|  नियमगिरि में आकर इसने स्टरलाइट नाम के फाउंडेशन के स्थापना की, कुछ लोगो के तहकीकात करने पर मालूम चला की ये वेदांत नाम की खनन कंपनी का ही हिस्सा है| हालाँकि वेदांत का नियमगिरि में आने का कारण सिर्फ 72 मिलियन टन बॉक्साइट हासिल करना नहीं बल्कि यहाँ से शुरू कर पूरे ओड़िशा के 3480 मिलियन टन बॉक्साइट का खनन करना इसका लक्ष्य था| जिससे यह अगले सात दशक तक अपने रिफाइनरी प्लांट को चला सकता था|

यहाँ वेदांत ने अपने प्लांट, गेस्ट हाउस और वेदांत कॉलोनी को बनाने के लिए हज़ारों गॉव वालो को विस्थापित किया| इसके आलावा यहाँ इसने दोनों जिलो में हज़ारों विज्ञापनरूपी स्तंभ सडको पर पटा रखे है| इन सभी विकासरूपी इमारतों के कारण पूर्णत: बेरोजगार हुये किसान अब दूसरो के खेतो में मज़दूरी करने को मजबूर है|

शुरुआत से ही डोंगरिया कोंध पूरी नियमगिरि पर्वत श्रंखला को बचाने के लिए राज्य सरकार, प्रशासन, पुलिस, वेदांत और न जाने किन-किन लोगो से लड़ रहे है| वेदांत पूरी चालाकियों और सरकार का साथ लेकर इन पहाड़ो को हथियाना चाहता है| लेकिन नियमगिरि सुरक्षा समिति के लोग जिनमे अधिकांश डोंगरिया लोग ही है, किसी भी क़ीमत पर इन पहाड़ो को छोड़ने को तैयार नहीं है| इस आंदोलन में शुरुआत से अब तक कई विरोध हुये जो कुछ इस प्रकार है|

– वर्ष 2003 में वेदांत ने ओड़िशा सरकार के साथ मिलकर नियमगिरि में खनन करने और अपना रिफाइनरी प्लांट लगाने के लिए एम.औ.यू. पर हस्ताक्षर किये| एवं उस वक़्त पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में ए.राजा विराजमान थे|

– वर्ष 2004 में पुलिस और गुंडों के बल पर 15000 लोगो को विस्थापित कर वेदांत ने अपने प्लांट की नीव रखी|

– वेदान्त की लांजीगढ़ रिफाइनरी में काम के समय की दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग मारे गये हैं और इलाके में इस बात को सारे लोग जानते हैं कि अक्सर मजदूरों से काम करवा कर उन्हें पैसा नहीं दिया जाता और उन्हें काम पाने के लिए काफ़ी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती है।

– ग्रामीणों के विरोध करने पर उनके साथ मार-पिटाई की गयी, उन्हें डराया धमकाया गया| साथ ही तक़रीबन 8000 लोगो को पकड़कर एक केम्प में बंद कर दिया गया, जहाँ उन्हें किसी से भी मिलने की इज़ाज़त नहीं डी गयी|

– प्लांट की नीव रखने के साथ ही वेदांत ने जंगलो की कटाई शुरू कर दी| विरोध करने पर आदिवासी नेता कुमटी माझी और अन्य कई लोगो को गिरफ्तार कर लिया गया|

– इसी बीच ओड़िशा वन विभाग ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को एक चिट्ठी लिख, वेदांत के बिना अनुमति के जंगल काटने की बात रखी| जिसके तुरंत बाद वेदांत को कारण बताओ और कम को तुरंत बंद करने का नोटिस थमाया गया|

– जब यह सब कुछ चल रहा था तब कंसारी गॉव से कुटिया कोंध के सुकरू माझी के विरोध करने पर वेदांत के गुंडों ने उसकी हत्या कर दी| और 25 अप्रैल 2004, रविवार के दिन हुई इस घटना के थोड़ी देर बाद ही दिल्ली में परिवेश मंत्रालय ने वेदांत को प्लांट का काम जारी रखने के लिए क्लीन-चिट दे दी|

– वर्ष 2005 में कुछ गॉव तो पूरी तरह से विस्थापित हो गये लेकिन कुछ जैसे बन्धुगुडा, बेलंबा, सिंधुवाली जैसे कई गॉव विरोध के लिए आगे खड़े रहे और अपनी ज़मीन देने से साफ इंकार करते रहे|

– इस दौरान तीन पर्यावरणविदो 1- प्रफुल सामंत्रा, 2- बिश्वजीत , 3- आर श्रीधर ने सर्वोच्च न्यायलय में एक अपील की जिसके अनुसार ‘नियमगिरि में आदिवासी रहते है, झरना बहता है, असंख्य वनस्पतीय यहाँ मोजूद है जिनसे कई बीमारियों से बचाव के लिए बहुमूल्य दवाएं बन सकती है|’

– सर्वोच्च न्यायलय ने उसी वर्ष एक जाँच कमेटी का गठन कर उसे नियमगिरि तहकीकात के लिए रवाना कर दिया| जिसने नियमगिरि के पक्ष में और वेदांत के खिलाफ अपनी जाँच रिपोर्ट पेश की|

– इसके कुछ समय बाद सर्वोच्च न्यायलय ने एक दल और जाँच के लिए नियमगिरि भेजा| जिसने वापस आकर पहले दल के अनुकूल ही अपनी रिपोर्ट पेश की साथ ही ये भी कहा की वेदांत कई मानवाधिकारों का उलंघन कर रहा है, और आदिवासियो को परेशान कर रहा है|

– दो कमेटियों की रिपोर्ट आने के बाद भी सर्वोच्च न्यायलय ने कोई फैसला नहीं लिया| बल्कि ओड़िशा सरकार और वेदांत से सलाह मांगी की वो इस मामले को किस तरह सुलझाना चाहते है|

– वर्ष 2007 तक वेदांत ने अपने प्लांट का निर्माण कार्य पूरा कर लिया| किन्तु सर्वोच्च न्यायलय का कोई निर्णय नहीं आया| कुछ समय बाद फैसला आया की नियमगिरि में विकास की जरुरत है, चूँकि आदिवासी लोग काफ़ी गरीब है| अत: ओड़िशा सरकार और वेदांत को उनके विकास और रोजगार के बारे में कार्य करने की आवश्यकता है| इस फैसले के तुरंत बाद आदिवासियो ने इसका जमकर विरोध किया|

– वर्ष 2007 में छतरपुर में एक आदमी की मौत होने के बाद वहाँ के लोगो ने वेदांत के अपव्यय जल आपूर्ति को बंद कर दिया|

– वर्ष 2008 में सर्वोच्च न्यायलय ने अपना अंतिम फैसला दिया जिसके तहत उसने वेदांत की नीतियों की तारीफ़ की एवं प्लांट को शुरू करने के लिए अन्य मंत्रालयों से अनुमति लेने के निर्देश भी दिये|

– तब से लेकर आज तक वेदांत हर रात को जंगलो को काटने की हर संभव कोशिश करता है और काट भी रहा है| जिसको वहाँ के लोग सभी को बताने की कोशिश भी कर रहे है|

– वर्ष 2009 में रंगोपाली गॉव में वेदांत के अपव्यय रासायनिक तालाब की वजह से 9 लोगो को मौत हो गयी| जिसके बाद डोंगरिया लोगो ने नियमगिरि में किसी भी बाहरी व्यक्ति के जाने से पूर्णत: रोक लगा दी|

– वर्ष 2008 में वेदांत का एल्युमिनियम निर्माण 1.5 मिलियन टन प्रति वर्ष था, जिसे उसने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद तीन गुना और बढ़ा लिया| इसके खिलाफ जन सुनवाई भी हुई जिसमे ग्रामीणों ने वेदांत का निर्माण कार्य को बढ़ने के खिलाफ बोला|

– 1.5 मिलियन टन एल्युमिनियम को बनाने के लिए 4.5 मिलियन टन बॉक्साइट की जरुरत होती है| नियमगिरि में कुल 72 मिलियन टन बॉक्साइट है जिससे प्लांट 18 वर्ष तक चलता किन्तु एल्युमिनियम की उत्पादन मात्र बढ़ा देने के बाद यह प्लांट पूरे नियमगिरि का बॉक्साइट मात्र 6 वर्षो में ख़त्म कर देगा|

– वर्ष 2009 में वेदांत की अपव्यय रासायनिक धूल ने वंसधारा नदी को पूर्णत: प्रदूषित कर दिया|

– इसी वर्ष 2009 में डोंगरिया कोंध के कुछ महत्वपूर्ण लोगो ने साथ मिलकरएक अपील पर हस्ताक्षर कर नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दाखिल की,जिसके बादपर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एन.सी.सक्सेना की एक कमेटी बिठायी। कमेटी नेपिछली कमेटी की तरह अपनी रिपोर्ट नियमगिरि के पक्ष में रखी। अपनी रिपोर्टमें कमेटी ने वेदांत के कई मानवाधिकारों का उलंघन करने की बात भी की, साथ ही प्रशासन और पुलिस का वेदांत के साथ होने की बात भी कही।

– उसकेबाद वर्ष 2010 में पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने वेदांत कीपर्यावरण अनुमती को रद्द कर दिया।

– वेदांत औए नियमगिरि की इस लड़ाई को देखकर उसके कुछ बड़े शेयर धारको जेसे चर्च ऑफ़ इंग्लेंड औए नोर्वे के लोगो का पेंशन प्लान का पैसा उन्होंने वापस निकाल लिया|

– वेदांत, ओडिशा सरकार के साथ मिलकर पुन सर्वोच्च न्यायालय गया। जहाँवर्ष 2013 के अप्रेल माह में एक ऐतिहासिक फैसला आया। सर्वोच्च न्यायालय नेओडिशा सरकार को यह निर्देश दिया की वह नियमगिरि जाकर वहाँ के आदिवासियोंकी खनन को लेकर राय जाने एवं ग्राम सभा कराये।

– इन सभी के बीच नियमगिरि के लोग वेदांत के गुंडों और पुलिस का सामना कर रहे थे। जिसमे नियमगिरि का (मंडलजानी) नियमगिरि में किसी भी समस्या को सुलझाने अथवा सर्वोपरि राय देनेवाला व्यक्तिलोधा सिकोका उनके साथ कुम्टी माझी,दोदी और पूरी डोंगरिया,डोम और कुटियाआबादीसभी सबसे आगे दिख रहे थे। यहाँ उनका साथ कुछसाम्यवादी और समाजवादी संघठनो के लोग भी दे रहे थे।

अब बात करते है पर्यावरण की, किसी भी रिफाइनरी प्लांट में 1 टन एल्युमिनियम बनाने के लिए निम्नलिखित चीजों की आवश्यकता पड़ती है –

1. 3 टन बॉक्साइट,

2. 6 टन कोयला,

3. 10 टन पानी|

एल्युमिनियम उद्योग सबसे ज्य़ादा ऊर्जा की खपत वाले उद्योगों में से एक है। अल्युमिना की एक मीट्रिक टन मात्रा के शोधन में औसतन 250 किलोवाट पावर (केवीएच) बिजली की खपत होती है जबकि एल्युमिनियम को गलाने में कम से कम 1300 केवीएच बिजली लग जाती है। जर्मनी के वप्परटल इन्स्टीट्यूट का अनुमान है कि एक टन एल्युमिनियम के उत्पादन में 1,378 टन से कम पानी नहीं लगता है (इस्पात की इसी मात्रा के उत्पादन में 44 टन पानी लगता है जो तुलना में काफ़ी कम होने के बावजूद ज्य़ादा ही है।) कुल मिला कर एक टन एल्युमिनियम बनाने में रिफाइनरियों में से 4 से 8 टन तक का ज़हरीला ठोस लाल कचरा निकलता है, मुख्यतः स्मेल्टर्स से लगभग 13.1 टन कार्बन-डाईऑक्साइड और 85 टन पर्यावरणीय कूड़ा-करकट और निर्जीव अपशिष्ट निकलता है। सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि एल्युमिनियम उत्पादन का नकारात्मक प्रभाव उसके सकारात्मक प्रभाव से 85 गुना ज्य़ादा है। इंग्लैण्ड सरकार की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले एक टन कार्बन उत्सर्जन से होने वाली क्षति की लागत 85 डॉलर प्रति टन बैठती है जिसका मतलब होता है एल्युमिनियम के एक टन के उत्पादन पर 1000 डॉलर का नुकसान।

पहाड़ों की चोटियों से बॉक्साइट के खनन से वहाँ की ज़मीन की उर्वरता को कितना नुकसान पहुँचा है, ये तो ठीक से बताना मुश्किल है। लेकिन बॉक्साइट में जल-संचय क्षमता बहुत ज्य़ादा होती है। यह रन्ध्र युक्त होता है और स्पंज की तरह काम करता है। बारिश के पानी को यह पूरे वर्ष तक पकड़ कर रखता है और धीरे-धीरे छोड़ता है। पहाड़ों के खनन से उनकी जल-संग्रह क्षमता तेज़ी से कम हो जाती है। इस समस्या का बहुत कम अध्ययन हुआ है और वह शायद इसलिए कि एल्युमिनियम कम्पनियाँ बॉक्साइट पर तो बहुत शोध करती हैं मगर उन शोधों से बचने की कोशिश करती हैं जिनसे उनके कारनामों का नकारात्मक पक्ष सामने आता है। मौसम परिवर्तन के क्षेत्र में वैज्ञानिक सबूतों के साथ जो चालबाज़ी खेली जा रही है, उसी की तर्ज पर ये विकृतियाँ भी खुल कर सामने आती हैं।

कारखाने ख़ुद पर्यावरण को इस कदर तबाह करेंगे कि जल्दी ही पश्चिमी उड़ीसा का एक बड़ा क्षेत्रा सूख कर खेती लायक नहीं बचेगा। बॉक्साइट के खनन से पहाड़ों की जल-धारण क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप पानी के स्रोत सूख जाते हैं। वैसे भी कारखानों में पानी की बहुत ज्य़ादा खपत होती है और उनसे पर्यावरण का भी प्रदूषण फैलता है। जंगलों की सफाई और कारखानों से निकलने वाला धुआं दोनों मिल कर बारिश की मात्रा को बेतरह घटा देते हैं। इस बात को न केवल आदिवासी अच्छी तरह जानते हैं, बल्कि वैज्ञानिक भी मानते हैं।

वेदांत को अपने रिफाइनरी प्लांट चलने के लिए 60 किमी दूर तेल नदी से पानी लेने की मंजूरी मिली है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इस कारण अब सूख चुका है| अपने प्लांट को चलाने के लिए वेदांत चोरी छिपे वंसधारा नदी से पानी ले रहा है| जो उसके लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है|

 

एल्युमिनियम को बनाने के दौरान हवा में होने वाले प्रदूषण में निम्नलिखित रसायन कारक है –

  • सल्फ़र ऑक्साइड,
  • नाइट्रस ऑक्साइड,
  • मरक्यूरिक,
  • आर्सेनिक,
  • फ्लोराइड |

ये सभी प्रदूषित धूल के रूप में पर्यावरण के लिए घातक है| साथ ही प्लांट से निकलने वाला तरल रसायन रेडियोएक्टिव प्रदूषण का कारण बनता है|

– 2010-2011 के बीच भारत के विभिन्न राज्यों में बॉक्साइट के भंडार और उसके मूल्य से ओड़िशा में इसके महत्त्व को अंक सकते है|

         स्थान                     मूल्य                           भंडार

छत्तीसगढ़                  2109945                     765262

ओड़िशा                   4856275                   2353153

झारखंड                  1827805                      619458

महाराष्ट्र                   2135235                    550780

नोट – 1000 रूपये में|

– वेदांत ओड़िशा में लंजिगढ़ वाले प्लांट को चलने के लिए निम्न जगहों से बॉक्साइट का आयत कर रहा है|

  • गुजरात मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन,
  • आशापुरा माइन चेम [महाराष्ट्र],
  • बाल्को छत्तीसगढ़|

इन सभी को कोई भी क्षेत्रीय अथवा राष्ट्रीय मीडिया नहीं उठा रहा है| उनका तो जंगल का रोमांचकारी सफ़र और विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी फैक्ट्रीयां ही ख़बर है|

जंगल में न्यायपालिका

18 जुलाई 2013 कोजिला रायगढ़ा के ग्राम सरकापाड़ी में पहले ग्राम सभा हुई। जहाँ सूरज निकलतेही पत्रकारों, पुलिस एवं प्रशासन के लोगो का जमावड़ा सा लग गया। गॉव के लोग दूसरे गॉवो से आने वाले लोगो के लिए खाने की व्यवस्था में जुटे हुए थे| कुछ समय बाद गॉव के चारोतरफ से कंधो पर कुल्हाड़ी और हाथो में डंडे लिए (जो उनका पारंपरिक हथियारहै) डोंगरिया लोगो की लम्बी कतारे गॉव में शामिल होने लगी।लगभग 200 पुलिसव सैना के हथियारबंद जवानो के साथ जिला जज शरत चंद्र मिश्रा जिनको एकनिरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था वहाँ पहुँचे। उनसे बात-चीत करने पर उन्होंने कहा
image

“यहाँ हम गॉव के लोगो की खनन को लेकरराय जानने के लिए आये है। सरकार अपना कम कर रही है और हम लोग अपना, जो लोगयहाँ बोल रहे है वही रिपोर्ट के तोर पर पेश किया जायेगा। इसके अलावा हम कुछऔर नहीं बोल सकते है।

इतनी भारी संख्यामें शस्त्र बल के साथ उनका वहाँ पहुचने का कारण महज़ सुरक्षा नहीं बल्कि गॉवके लोगो में भय पैदा करना था। ग्राम सभा के शुरू में ही जिला जज ने अपनेसाथ आये लोगो, पत्रकारों औरसरकापाड़ी गॉव के लोगो को ही सभा में शामिल होने दिया। सभा शुरू होते ही गॉव के एक लड़के गोविन्द ने जज के समक्ष दोबाते साफ कर दी पहला कुई भाषा से उड़िया भाषा के लिए आनुवादक उनकी तरफ सेहोगा। दूसरा ग्राम सभा का विडियो दस्तावेज उनके साथियों द्वारा भी कियाजायेगा। पहले तो जज ने दोनों ही बातो के लिए साफ इंकार कर दिया लेकिन लोगोके ज्यादा दबाव डालने पर उन्हें मंजूरी देनी पड़ी।

शिवपदर पंचायत के तहसीलदार ने सबसे पहले वन आधिकार कानून के तहत नियमगिरिमें उनको दिए जाने वाली जमींन का ब्यौरा दिया। जिसका सभी गॉव वालो ने एकसाथ मिलकर बहिष्कार कर दिया। इसके बाद एक-एक करके सभी बालिग गॉव वालो कोखनन के बारे में उनकी राय जानने के लिए बुलाया गया। जहाँ हर एक गॉव वाले नेवेदांत, राज्य सरकार और केंद्र सरकार का खुलकर विरोध किया एवं किसी भी कीमतपर नियमगिरि में खनन न होने देने की बात कही।

यहाँ गोबिंद ने विस्तार सेनियमगिरि पर उनके धार्मिक, सांस्कृतिक एवं स्थानीय अधिकार के बारे में जजऔर अन्य लोगो को बताया। यहाँ बोलने वाले हर एक ग्रामीण के अनुसार –

‘नियमगिरि उनका माता-पिता है, उसने उनको जीवन दिया है, उनकी रक्षा करताहै, उनका इष्ट देवता है, उन्हें खाना, दवाई, फल-फूल सभी कुछ देता है, रक्त की आखरी बूंद बहा देंगे लेकिन नियमगिरि नहीं छोड़ेंगे।’  इन सभी बातोको लिख कर जब तहसीलदार ने सुनाया तो उनमे कई महत्वपूर्ण बाते नदारद दिखीजैसे ‘सम्पूर्ण नियमगिरि हमारा इष्ट देवता है। और 30 किलोमीटर के क्षेत्रमें फैली सम्पूर्ण पर्वत श्रंखला को वो नियमगिरि बोलते है।’

इन सभी बातो कोदोबारा लिखने के लिए बोलने पर पहले तो जिला जज ने साफ इंकार कर दिया औरकहा की जो कुछ भी लिखा है ठीक है। लेकिन लोगो के न मानने पर जज ने गुस्सेमें आकर कई बार गॉव वालो को मूर्ख कहा एवं डाटा।  लोगो के तब भी न मानने परअंत में जज को हार माननी पढ़ी और डोंगरिया लोगो द्वारा कही हर बात कोलिखवाना पड़ा।

इसके बाद केसरपाड़ी(22 जुलाई), ताड़ीझोला(23 जुलाई), कुनाकाडू(24 जुलाई), पालबेरी(25 जुलाई), बाटुडी(25 जुलाई), लाम्बा(1 अगस्त), लाकपदर(8 अगस्त), कम्बेसी(१३ अगस्त) और आखरी ग्राम सभा मुनिगुडा ब्लॉग में शिवपदर पंचायत के गॉव जरपा में 19 अगस्त 2013 को हुई जहाँ पिछली सभी ग्राम सभाओ की तरह सभी गॉव वालो ने साथ मिलकर वेदांत को ख़ारिज कर दिया| पहली ग्राम सभा से अंतिम तक सैना, पुलिस, प्रशासन और मीडिया की जितनी भीड़ मुझे देखने को मिली उससे कही ज्यादा हर जगह डोंगरिया लोग मोजूद थे। हर किसी के चहरे पर वेदांत के लिए विरोध और नियमगिरि को किसी भी कीमत पर बचा लेने का आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।
image

डोंगरिया लोगो की वेदांत के खिलाफ चल रही इस 11 साल लम्बी लड़ाई में सैकड़ो लोगो को जेल जाना पड़ा।, पुलिस और वेदांत के गुंडों की मार खानी पड़ी।, फेक्ट्री से निकलने वाले जहरीले प्रदुषण की बलि कई ग्रामीण चढ़ गये। कई लोगो को शारारिक समस्याएँ पैदा हो गयी।  लेकिन प्रशासन, राज्य सरकार, केंद्र और न्यायपालिका ने चुप्पी साधे रखी।

वेदांत पैसे के बल पर कुछ लोगो को अपने इशारो पर चलता रहा और वो सभी लोग चलते रहे। ग्राम सभाओ के दौरान राष्ट्रीय मीडिया के कई लोगो ने क्षेत्रीय पत्रकारों के साथ जाकर वेदांत की शाही दावत के लुफ्त उठाये। NDTV ने तो वेदांत से पैसा लेकर प्रियंका चोपड़ा के साथ सेव गर्ल नाम का कार्यक्रम भो शुरू कर दिया है|

अब जब 12-0 से नियमगिरि की जीत और वेदांत की हर हो चुकी है तब कुछ बड़े-बड़े एन.जी.ओ. और कांग्रेस इस जीत का सेहरा अपने सर पर बंधने की कोशिश कर रहे है। वर्ष 2008 और 2010 में जब आन्दोलन अपने चरम पर था तब चुनावी फायदा लेने राहुल गाँधी यहाँ पहुचे थे और अब दोबारा से राहुल गाँधी द्वारा जिला रायगढा में एक लम्बी रेली करने की खबरे मिलना शुरू हो गयी है। जिसमे डोंगरिया लोगो पर शामिल होने का दबाव भी बनाया जा सकता है।

कुल मिलकर डोंगरिया कोंध की बहादुरी और लम्बी लड़ाई के साथ साथ कशीपुर, कलिंगनगर, जगतसिंहपुर जैसे ओडिशा के कई आन्दोलन पूरे देश और दुनिया के लिए पूंजीवाद और तानाशाही के खिलाफ खड़े होने के लिए एक मिसाल है।

 

 

बात-चीत

    यहाँ सबसे पहले मैने ‘नियमगिरि सुरक्षा समिति’ और समाजवादी जन परिषद् के एक अहम कार्यकर्ता ‘लिंगराज आजाद’ से बात की –  
image

सवाल 1 – वेदांत के खिलाफ नियमगिरि के लोगो की इस लड़ाई के बारे में थोडा विस्तार देंगे?

जल, जंगल और ज़मीन को बचाने की इस लड़ाई में हम सिर्फ वेदांत के खिलाफ ही नहीं है बल्कि उन सभी के खिलाफ है जो हमे यहाँ से निकालकर प्रकति की इस सुंदर देन को और हमारे घर को तबहा करना चाहते है। और दुःख की बात यह है की राज्य सरकार इस लड़ाई में हमारा नहीं बल्कि वेदांत का साथ दे रहा है।

 

सवाल 2 – पिछली 12 ग्राम सभाओ में डोंगरिया लोगो ने वेदांत को सिरे से ख़ारिज कर दिया है, क्या सभी गॉवो में वेदांत को लेकर यही रुख है ?

सिर्फ 12 ही नहीं बल्कि पूरे 112 गॉवो में वेदांत के खिलाफ डोंगरिया लोगो में आक्रोश भरा पड़ा है। अगर मोका मिलता तो पूरा नियमगिरि एक साथ मिलकर वेदांत का विरोध ग्राम सभाओ के जरिये करता। हम लोगो ने गवर्नर को एक चिट्ठी लिखकर पूरे नियमगिरि में ग्राम सभा कराने की मांग भी की थी। साथ ही ‘मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स’ ने भी इसी संबंध में ओडिशा सरकार को एक चिट्ठी लिखी थी।

 

सवाल 3 – वेदांत के खिलाफ इस लड़ाई में डोंगरिया कोंध के साथ और कौनकौन है ?

इस लड़ाई में डोंगरिया कोंध अकेले बिलकुल नहीं है, यहाँ उनके साथ नियमगिरि के चारो और फैले कुटिया कोंध के लोग और आस-पास बसे शहरो के लोग भी है। नियमगिरि से सिर्फ डोंगरिया लोगो की ही नहीं बल्कि जिला रायगड़ा और कालाहांडी में बसे लाखो लोगो की जीविका और भावनाएँ जुडी है। जिसमे इनका साथ कुछ सामाजिक कार्यकर्ता भी दे रहे है।

 

सवाल 4 – वर्तमान में लोगो को वेदांत से क्या क्या समस्याएँ हो रही हैं ?

अभी ग्राम सभा के कारण वेदांत कोई समस्या उत्पन्न नहीं कर रहा है। कुछसमय पहले तक कभी वेदांत के गुंडे, कभी पुलिस तो कभी सेना के लोग नियमगिरिमें आते थे और सभी लोगो को परेशान करते थे। कभी माओवादियो को खोजने के नामपर तो कभी कोई और नया बहाना लेकर। इसके अलावा वेदांत के कारखाने से निकलनेवाले प्रदूषण की वजह से काफी समस्या पैदा हुई हैं। नियमगिरि से निकलने वालीप्रमुख नदी वंसधारा तो एक बार कारखाने से निकलने वाली सफ़ेद धूल से ढक गयी थी। वेदांत पानी की आपूर्ति को पूरा करने के लिए तेल नदी का सारा पानी सोख चुका है और अब वंसधारा का पानी बिना अनुमति के चोरी कर रहा है।

 

सवाल 5 – सभी ग्राम सभाओ में मिली इस जीत का श्रेय आप किसको देना चाहेंगे?

इस जीत का श्रेय अगर किसी को मिलना चहिये तो वो है डोंगरिया कोंध और उनके साथ इस आन्दोलन में खड़े हर एक आदमी को, असल में सिर्फ नियमगिरि ही नहीं बल्कि पूरे ओडिशा में जल, जंगल और ज़मीन को बचने की लड़ाई में कई जनांदोलन हो रहे है।  इन जनांदोलनो की सबसे बड़ी खुभी ये है की इनमे कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि इन्ही आदिवासियों, ग्रामीणों और किसानो में से ही कोई आगे बढ़कर दिशा देता है। चाहे फिर वो नियमगिरि हो, काशीपुर, कलिंगनगर या फिर जगतसिंहपुर ही क्यों न हो।

 

 

इसके बाद मैने डोंगरिया कोंध के मंडलजानी और इस आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता लोधो सिकोका से बात की जिनके अनुसार –

1-Dongria-440x250

सवाल 1- नियमगिरि में आप सभी किसका विरोध कर रहे है और क्यों

पिछले 11 वर्षो से हम वेदांत का नियमगिरि में खनन और लान्जिगढ़ में लगी फेक्ट्री को लेकर विरोध कर रहे हैं। लेकिन प्रशासन और पुलिस हमेशा ही उसका साथ दे रहे है। हमारे नियमगिरि न छोड़ने पर कभी पुलिस हमे परेशान करती है तो कभी वेदांत के गुंडे गॉव वालो के साथ मारपीट करते है।

 

सवाल 2- नियमगिरि में वेदांत के आने से आपको किस तरह की परेशानी होगी ?

नियमगिरि में वेदांत आकर यहाँ के सभी पहाड़ो का खनन करना चाहता है। ये सभी पहाड़ हमारे माता-पिता, हमारे इष्ट देवता हमारे लिए सबकुछ है। काफी समय से कारखाने से निकलने वाले धुएं और भी न जाने क्या-क्या से हमारे कई गॉव वालो की  मौत हो गयी है और कई तरह की नई-नई बीमारिया गॉंवो में फ़ैल रही हैं। इसकी शिकायत लेकर जब हम पुलिस के पास जाते है तो वो हमे ही डांट और मार-पीट कर वापस भगा देते है।

 

सवाल 3- पुलिस और वेदांत के लोग आपको किस तरह से परेशान करते है ?

मओवादियो के नाम पर पुलिस आये दिन हम लोगो को परेशान करती रहती है। काफी बार गॉव के लोगो को ही उठा कर ले जाती है। कुछ समय पहले मुझे खुद पुलिस उठा कर ले गयी थी और तीन दिन तक लगातार मेरी पिटाई की गयी। पुलिस वाले पीटते हुए कह रहे थे की और नेता बनना है ? दूसरी तरफ वेदांत के गुंडे हमे नियमगिरि छोड़ कर चले जाने, नहीं तो जान से मारने की धमकी हमेशा देते रहते है।

 

 

सवाल 4- ओडीशा सरकार या किसी और पार्टी का कोई नेता कभी आपका हाल जानने के लिए क्या यहाँ पहुँचा  है ?

चुनाव के समय सब लोग आकर मिलते है कभी कांग्रेस के राहुल गाँधी तो कभी कोई और तब कोई हमे माओवादी क्यों नहीं कहता है ? जब हमे उनकी चुनावी रैली में शामिल किया जाता है तब पुलिस को हमसे कोई खतरा मालूम नहीं होता ? चुनाव के समय सभी नेता आते है रैली करते है और झूठे वादे करके चले जाते हैं। शहरो की आबादी और गन्दगी से कोसो दूर हम सुकून की ज़िन्दगी जीना चाहते है पर हर कोई हमे परेशान कर रहा है।

 

धन्यवाद् 

सौरभ कुमार

दिल्ली विश्वविध्यालय   

 Mob – 08130568120

Saurabhverma4592@gmail.com

लेख को लिखने में सहायक सामग्री और व्यक्ति

–       फ़िल्मकार सूर्या शंकर दाश

–       वेदांत बिलियनस, लेखक: रोहित पोद्दार

–       हाशिया ब्लॉग: हुजूर! यह विकास का मतलब क्या होता है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/04/2010

–       इन्टरनेट

–       लिंगराज आज़ाद

–       भालाचंद्र सडंगी

 

कौन गैरहाजिर है

शायद ये वो दौर चल रहा है जब इस दुनिया की सबसे खुबसूरत कवितायें और कहानियाँ हम से रूठ कर अलविदा कहे जा रही है। पीछे छूटे जा रही है तो उनकी कलम जो हमे मौका दे रही है उन्हें याद करने का ऐसी ही एक कविता आज हम से बिछड़ गयी है जिसे में उसी की कलम से याद कर रहा हूँ।
शुक्रिया रोज़ेविच अब तक साथ देने का

    “कौन गैरहाजिर है”

(अपने नन्हें विद्यार्थी जिसजेक की स्मृति में)

कौन डूब गया
कौन नहीं है यहाँ

कौन बिलख रहा है इस बुरी तरह
कौन खामोश है
कौन जिसके ओठ नहीं

ये क्या है
तैर कर ऊपर आता
उफ़ कितना खौफनाक है यह नन्हा बदन
फूलता हुआ

यह तमाम हलचल ये तमाम लफूज़
कौन नहीं है यहाँ
वही
वह अच्छा लड़का
बदल गया है
चीज़ में
जो बड़ी सफाई से
बाहर आ रही है पानी से
और चाक कर रही है सीना माँ का

● तद्यूश रोज़ेविच

image

अंग्रेजी से अनुवाद : सोमदत्त

वली दकनी

बात इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरुआती दिनों की है
जब बर्बरता और पागलपन का एक नया अध्याय शुरू हो रहा था
कई रियासतों और कई किस्म की सियासतों वाले एक मुल्क में गुजरात नाम का एक सूबा था
जहाँ अपने हिंदू होने के गर्व और मूर्खता में डूबे हुए क्रूर लोगों ने –
जो सूबे की सरकार और नरेंद्र मोदी नामक उसके मुख्यमंत्री के
पूरे संरक्षण में हजारों लोगों की हत्याएं कर चुके थे
और बलात्कार की संख्याएं जिनकी याददाश्त की सीमा पार कर चुकी थीं

– एक शायर जिसका नाम वली दकनी था का मज़ार तोड़ डाला !

वह हिंदी उर्दू की साझी विरासत का कवि था
जो लगभग चार सदी पहले हुआ था और प्यार से जिसे बाबा आदम भी कहा जाता था।

हालाँकि इस कारनामे का एक दिलचस्प परिणाम सामने आया
कि वह कवि जो बरसों से  चुपचाप अपनी मज़ार में सो रहा था
मज़ार से बाहर आ गया और हवा में फ़ैल गया!
इक्कीसवीं सदी के उस शुरुआती साल में एक दूसरे कवि ने
जो मज़ार को तोड़ने वालो के सख्त ख़िलाफ़ था
किसी तीसरे कवि से कहा कि
मैं दंगाइयों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ
कि उन्होंने वली की मज़ार की मिट्टी को
सारे मुल्क की मिट्टी, हवा और पानी का
हिस्सा बना दिया !

अपने हिंदू होने के गर्व और मूर्खता में डूबे उन लोगों को
जब अपने इस कारनामे से भी सुकून नही मिला
तो उन्होंने रात दिन महनत मशक्कत करके
गेंदालाल पुरबिया या छज्जूलाल अढाऊ जैसे ही
किसी नाम का कोई एक कवि और उसकी कविताएं ढूंढ़ निकलीं

और उन्होंने दावा किया कि वह वली दकनी से भी अगले वक़्त का कवि है
और छद्म धर्मनिरपेक्ष लोगों के चलते उसकी उपेक्षा की गई
वरना वह वली से पहले का और ज्यादा बड़ा कवि था !
फिर उन लोगों ने जिनका जिक्र ऊपर कई बार किया जा चुका है
कोर्स की किताबों से वो सारे सबक़ जो वली दकनी के बारे में लिखे गए थे चुन-चुनकर निकाल दिए।

यह क़िस्सा क्योंकि इक्कीसवीं सदी की भी पहली दहाई के शुरुआती दिनों का है
इसलिए बहुत मुमकिन है कि कुछ बातें सिलसिलेवार न हों
फिर आदमी की याददाश्त की भी एक हद होती है !

और कई बातें इतनी तकलीफदेह होती है कि उन्हें याद रखना और दोहराना भी तकलीफदेह होता है
इसलिए उन्हें यहाँ जान-बूझकर भी कुछ नामालूम-सी बातों को छोड़ दिया गया है
लेकिन एक बात जो बहुत अहम है और सौ टके सच है
उसका बयान कर देना मुनासिब होगा
कि वली की मज़ार को जिन लोगों ने नेस्तनाबूत किया
या यह कहना ज्यादा सही होगा कि करवाया
वे हमारी आपकी नसल के कोई साधारण लोग नहीं थे
वे कमाल के लोग थे
उनके सिर्फ शरीर ही शरीर थे
आत्माएं उनके पास नहीं थीं
वे बिना आत्मा के शरीर का इस्तेमाल करना जानते थे
उस दौर के क़िस्सों में कहीं-कहीं इसका उल्लेख मिलता है
कि उनकी आत्माएं उन लोगों के पास गिरवी रखी थी,
जो विचारों में बर्बरों को मात दे चुके थे
पर जो मसखरों की तरह दिखते थे
और अगर उनका बस चलता तो प्लास्टिक सर्जरी से
वे अपनी शक्लें हिटलर और मुसोलिनी की तरह बनवा लेते !

मुझे माफ़ करें मैं बार-बार बहक जाता हूँ
असल बात से भटक जाता हूं
मैं अच्छा किस्सागो नहीं हूं
पर अब वापस मुद्दे की बात पर आता हूं

कोर्स की किताबों से वली दकनी वाला सबक़
निकाल दिए जाने से भी जब उन्हें सुकून नहीं मिला
तो उन्होंने अपने पुरातत्वविदों और इतिहासकारों को तलब किया
और कहा कि कुछ करो, कुछ भी करो
पर ऐसा करो
कि इस वली नाम के शायर को
इतिहास से बाहर करो !

यक़ीन करें मुझे आपकी मसरुफियतों का ख्याल है
इसलिए उस तवील वाकिये को मैं नहीं दोहराऊंगा
मुख़्तसर यह कि
एक दिन….!

ओह ! मेरा मतलब यह कि
इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरुआती दिनों में एक दिन
उन्होंने वली दकनी का हर निशान पूरी तरह मिटा दिया
मुहावरे में कहे तो कह सकते हैं
नामोनिशान मिटा दिया !

उन्ही दिनों की बात है कि एक दिन

जब वली दकनी की हर याद को मिटा दिए जाने का
उन्हें पूरा इत्मीनान हो चुका था
और वे पूरे सुकून से अपने-अपने बैठकखानों में बैठे थे
तभी उनकी छोटी-छोटी बेटियां उनके पास से गुजरी
गुनगुनाती हुई

……………………..

वली तू कहे अगर यक वचन
रकीबां के दिल में कटारी लगे !

image

‘राजेश जोशी’

क्योंकि, अच्छे दिन आने वाले है।

फिर से बहेगा खून
गूंजेगी चीत्कारे
बच्चे
माँ की कोख से
जन्मेंगे
तलवारो के सहारे

फिर से चलेगी आँधी
फैलेंगे दहशत के अंगारे
पानी, खाद और बीजों की
बाट जोटेंगे
खेत
झूलेंगी फंदों पर
गर्दने किसानों की

क्योंकि
अच्छे दिन आने वाले है

फिर से पढेंगे कसीदे
फांसीवाद के,
हिंदू राष्ट्र के

फिर लगेंगे नारे
तेज़
और
तेज़
‘जिस हिंदू का खून न खोला
खून नहीं वो पानी है’

क्योंकि
अच्छे दिन आने वाले है

फिर होंगे
नरसंहार
फिर चड़ेगी
नर बलि

फिर इंसानी दहन के
काम
आएंगे
स्कूटर, मोटर
और
साईकल के टायर

क्योंकि
अच्छे दिन आने वाले है

फिर बनेगा मंदिर
मस्जिद को तोड़कर
फिर कहलायेंगे
आतंकी
दाड़ी-टोपी वाले

फिर लोटेगी
रणवीर सैना
लोटेंगे
बजरंगी

फिर होगी दहशत
तिलक की
और
कच्छे वालो की

क्योंकि
अच्छे दिन आने वाले है

फिर होगा इंतजार
और
फिर होगा इंतजार
शायद
अच्छे दिन का इंतजार।
image

image

image

‘सौरभ’

हिंदू राष्ट्र के मायने

                   6

   जातिप्रथा से आर्थिक उन्नति नहीं होती। जातिप्रथा से न तो नस्ल या प्रजाति में सुधार हुआ है और न ही होगा। लेकिन इससे एक बात अवश्य सिद्ध हुई है कि इससे हिंदू समाज पूरी तरह छिन्न-भिन्न और हताश हो गया है।
   सबसे पहले हमें यह महत्वपूर्ण तथ्य समझना होगा कि हिंदू समाज एक मिथक मात्र है। हिंदू नाम स्वयं विदेशी नाम है। यह नाम मुसलमानों ने भारतवासियों को दिया था, ताकि वे उन्हें अपने से अलग कर सकें। मुसलमानों के भारत पर आक्रमण से पहले लिखे गए किसी भी संस्कृत ग्रंथ में इस नाम का उल्लेख नहीं मिलता। उन्हें अपने लिए किसी समान नाम की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी, क्योंकि उन्हें ऐसा नहीं लगता था कि वे किसी विशेष समुदाय के हैं। वस्तुत: हिंदू समाज नामक कोई वस्तु है ही नहीं। यह अनेक जातियों का समवेत रूप है। प्रत्येक जाति अपने अस्तित्व से परिचित है। वह अपने सभी समुदायों में व्याप्त है और सबको स्वयं में समाविष्ट किए हुए है और इसी में उसका अस्तित्व बना हुआ है। जातियों का कोई मिला-जुला संघ भी नहीं है। किसी भी जाति को यह महसूस नहीं होता कि वह अन्य जातियों से जुडी हुई है – सिर्फ उस समय को छोड़कर, जब हिंदू मुस्लिम दंगे होते है। अन्य सभी अवसरों पर तो प्रत्येक जाति यह कोशिश करती है कि वह अपनी अलग सत्ता को ठीक से बनाये रखे और दूसरों से स्पष्ट रूप से अलग रहे। प्रत्येक जाति अपनों में ही खान-पान और शादी ब्याह का संबंध रखती है, यहाँ तक कि हर जाति अपना एक अलग पहनावा तक तय करती है। इस बात से अलग दूसरा कारण क्या हो सकता है कि भारत में नर-नारी असंख्य किस्मो के परिधान पहनते है, जो कि पर्यटकों के लिए हैरानी का कारण है। दरअसल हर आदर्श हिंदू उस चूहें की तरह है जो अपने ही बिल में घुसा रहता है और दूसरों के संपर्क में नहीं आना चाहता। हिंदुओ में उस चेतना का सर्वथा अभाव है, जिसे समाजविज्ञानी-‘समग्र वर्ग की चेतना’ कहते है। उनकी चेतना समग्र वर्ग से संबंधित नहीं है। हर एक हिंदू में जो चेतना पाई जाती है, वह उसकी अपनी ही जाति के बारे में होती है। किसी कारण यह कहा जाता कि हिंदू लोग अपना समाज या राष्ट्र नहीं बना सकते। लेकिन अनेक भारतीयों की देशभक्ति की भावना उन्हें यह मानने की अनुमति नहीं देती कि वे एक राष्ट्र नहीं है अथवा वह विभिन्न समुदायों का मात्र एक अव्यवस्थित समूह है। वे इस पर आग्रह करते है कि ऊपर से अलग अलग दिखने वाली हमारी जनता में एक मूलभूत एकता है, जो हिंदुओ के जीवन की विशेषता है, क्योकि उनकी आदतों, प्रथाओं, विश्वासों और विचारों में एकरूपता है, जो भारत में सर्वत्र द्रष्टिगत होती है। इसमें संदेह नहीं कि उनके स्वभाव, रीति-रिवाजों, धारणाओं और विचारों में समानता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना स्वीकार्य नहीं होगा की हिंदू जनता को हिंदू समाज की स्थिति प्राप्त है, ऐसा मान लेने का अर्थ है – समाज-रचना के अपरिहार्य तत्वों को सही रूप में न समझना केवल भौतिक द्रष्टि से पास-पास रहने के कारण लोगों को उस व्यक्ति से अधिक समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती जो अपने समाज से मीलों दूर रहने पर अपने समाज का सदस्य नहीं रहता है। दूसरी बात यह है कि केवल आदतों, रीति-रिवाजों, धारणाओं और विचारों की समानता होने से ही व्यक्तियों को ‘समाज’ नहीं कहा जा सकता। चीजें भौतिक रूप से एक से दूसरे व्यक्ति के पास पहुंच सकती है -जैसे ईंटें। इसी तरह एक समुदाय की आदतें, रीति-रिवाज, धारणाएं और विचार भी दूसरे समुदाय द्वारा अपनाये जा सकते है और इस तरह दोनों समुदायों में समानता प्रतीत हो।
   संस्कृति विकर्ण होकर फैलती है और इसी कारण पास-पास न रहते हुए भी अनेक आदिम जातियों की आदतों, रीति-रिवाजों, धारणाओं और विचारों में समानता दिखाई देती है। लेकिन कोई यह नहीं कह सकता क्योंकि इन आदिम जातियों में समानता है, इसलिए उनका एक समाज है। कुछ बातों में समानता एक समाज के निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं है। लोग एक समाज का निर्माण करते है, क्योंकि वे समान रूप से व्यवहार करते है। व्यवहार में समभाव का होना समानुरूप से व्यवहार करने से सर्वथा भिन्न है। चीजों को समभाव रूप में अपनाने का एकमात्र उपाय यही है कि सभी का एक-दूसरे से पूरा-पूरा संपर्क रहे। इसी बात को दूसरे ढंग से कह सकते है कि समाज आपसी संपर्क और आपसी संवाद को सतत: जारी रखकर ही अपने अस्तित्व को बनाए रखता है। मूर्तरूप से कहा जाये तो सिर्फ यही काफी नहीं है कि सभी लोग वैसे ही आचरण करे, जैसे अन्य लोग कर रहे है। अगर अलग-अलग लोग एक जैसा ही सबकुछ कर रहे है, तो भी उन्हें उसी समाज का अंग नहीं माना जा सकता। यह इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुओं की विभिन्न जातियों के लोग एक से ही त्यौहार मनाते है। लेकिन अलग-अलग जातियों द्वारा उन्ही त्योंहारो के मनाए जाते रहने के बावजूद वे एक समाज में नहीं बंध पाए है। इसके लिए यह अनिवार्य है कि सभी लोग किसी सामूहिक कार्य में इस प्रकार मिलजुलकर बराबरी से हिस्सा ले या भागीदारी करे कि उन सभी में भी वे ही भाव हो जिनसे शेष अन्य लोग अनुप्राणित होते है। लोगो को जो चीज़ आपस में एक में एक सूत्र में बांधती और उन्हें एक समाज में पूरी तरह शामिल करती है, वह यह है कि हरेक व्यक्ति को सामाजिक गतिविधियों में इस तरह हिस्सेदार या भागीदार बनाया जाये, ताकि उसकी सफलता में उसे स्वयं अपनी सफलता और उसकी विफलता में अपनी विफलता दिखाई दे। जातिप्रथा इस प्रकार की सामूहिक गतिविधियों का आयोजन नहीं होने देती और सामूहिक गतिविधियों को इस प्रकार वर्जित करके ही उसने हिन्दुओं को एक ऐसे समाज के रूप में उभरने से रोका है, जिसमे सभी समुदाय एक होकर जिएं और उनमे एक ही चेतना व्याप्त हो जाए।

‘जातिप्रथा-उन्मूलन’,
खंड – 1
अम्बेकर समग्र
प्रष्ठ – 69-71

क्या होगा, उन लाखो का सूर्योदय

सुबह
जब अंधेरो को तोड़कर
दिखाई देते है
परछाईनुमा मकानों के
अजीबो-गरीब रंग

जब जंग से अपना रंग खो चुकी
साईकिलें चलती है
खाली रोड पर
बिलकुल किसी
बीएमडब्लू की तरह

घंटियो की वो अनगिनत आवाज़े
जो अपनी एक निरंतर चाल के साथ
करती है आगह
पैदल चलती उस भीड़ को

भीड़

जिसमे है
सरकारी स्कूलों के बच्चे,
भोपूओं की आवाज़ सुनकर
हाथ मेहनत से काले करने चले
कई सारी फैक्ट्रियों के मजदूर

और है
कई सारी औरतें
जिन्हें डर है
मालिक की डांट का

चूँकि कई बार की तरह
आज वो फिर पहुँचेंगी देर से

घंटियो से निकलती
ट्रिन की आवाज़
बढ़ा रही है
इन सभी के कदमों की आहट

पहुंचा रही है
मंजिल के और नजदीक
बच्चे स्कूल पहुँच जायेंगे,
मजदूर फैक्ट्री

और

जब औरतें पहुचेंगी
अपनी मंजिल पर
तब होगा सूर्योदय

जागेंगे लाखो लोग
जिनकी जी हजूरी पर
निर्भर है
करोड़ो का भविष्य

निर्भर है
उन बच्चो की स्कूल की नई वर्दी
जिसके बिना
जन गण मन से पहले ही
कर दिया जाता है
उन्हें लाइन हाज़िर
पड़ते है हाथो और कूल्हों पर हैडमास्टर के डंडे

निर्भर है
उस एक कमरे का किराया
जो पूरा पड़ता है
मिलबांट कर कमाने से

हाड़-मांस को थका देने वाले
उस काम के
आदि हो गये है
सब

यू तो रोज़ होता है
सूर्योदय
पर जिस दिन
न होंगी ये महिलायें

क्या होगा
उन लाखो का
सूर्योदय ?

न मो दी इस बार

“अब की बार बिलकुल नहीं मोदी सरकार”
बस अब बहुत हो गया ये तो हद ही हो गयी है यार ऐसे क्या गुजरात को मोदी ने अमरीका बना दिया है, जो टीवी पर हर 10 मिनट बाद, अबकी बार मोदी सरकार-मोदी सरकार के चाटुकारों वाले नारे हर चैनल पर लग रहे है। मैं यहाँ तथ्यों की बात नहीं करूँगा चूँकि मोदी के पक्ष और विपक्ष में पूरा फेसबुक(अगर यहाँ की बात की जाये तो) पटा हुआ है। मैं न गोदरा को घसीटूंगा न वर्तमान में मोदी के अम्बानी, अडानी, टाटा और ऐसे ही किसी और पूंजीपति यार से उनके रिश्ते को।
लेकिन मोदी के समर्थको और टेलीविजन के भोले-भाले दर्शको सिर्फ 5 मिनट के लिए, ज्यादा नहीं दिमाग लगाओ और सोचो की अगर संघ के इस लाल ने असल में ही गुजरात में इतना ही विकास किया होता तो क्या उसे सच में सास बहु के नाटको में विघ्न डालने वाले सर्फ़, साबुन और त्वचा को निखारने वाले विज्ञापनों में करोडो रुपया फूंककर घुसपैठ करने की ज़रूरत थी ?
क्यों मोदी को अगस्त 2007 से मार्च 2013 तक 25000 डॉलर प्रतिमाह एक जनसंपर्क एजेंसी (ऐपको) को देने की आवश्यकता थी जो सिर्फ उनकी अफ्वाही तोर पर छवि सुधारने का काम अब तलक कर रही है, न जाने अब कितने अरबों फूंक दिए होंगे।
मैं जानता हूँ इस देश से जात-पात और धर्म को ख़त्म करना वाकई मुश्किल है लेकिन 21वी सदी की औलादों जरा सोचो आज क्या तुम्हारे पास इतना समय है के तुम धर्म और विकास के झूठे दावो में फंसकर अपने देश को और गर्त में डालने के लिए फिर से तैयार हो ? और वो भी उस आदमी के लिए जो हिंदुत्व की झूठी दुहाई देकर नरसंहार को भी जायज़ मानता है।
फैसला अब तुम्हारे हाथ में है वोट दो पर पहले समझो जानो और फिर देश की लगाम सही हाथो में दो पर मोदी बिलकुल नहीं चूँकि
अब बारी है इन्सान बनने की नाम नहीं।

जिन्हें नाज़ है हिंद पे

कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है,

जो मुहाफ़िज़ है ख़ुदी के,

जिन्हें नाज़ है हिंद पे ?

    एक अपील

मैं आज देश के हर एक उस शख्स से जो अपने आप को बुद्धिजीवी, कलाकार, शिक्षक और छात्र कहता है या लोग उसे मानते है। से अपील या पूछना चाहता हूँ कि आखिर वो कहाँ है ?
जो बात करते है समाजवाद, साम्यवाद और इंसानियत की। आज जब देश का भविष्य तय होने की तारीखे गुजरती जा रही है, वो फैसला नजदीक आ रहा है जो यह तय करेगा कि क्या हमें भूमिगत होकर अपनी चुनोतियों को पूरा करना है या फिर जैसा अब तक चल रहा है उसी तरह।
आज लगता है सबकी ज़ुबाने या तो सिल दी गयी है या काट दी गयी है, या फिर किसी कारण बंद है।
जो बोले है/थे बिनायक सेन, सोनी सोरी, सीमा आज़ाद, अफज़ल गुरु, जम्मू कश्मीर, कुडनकुलम, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ हर उस के बारे में जो आंदोलन की मांग कर रहे है/थे। आज जब लोगो को उनकी राय की बेहद ज़रूरत है सभी गायब है या नज़र में आकार भी कुछ बोलना नहीं चाहते है।
मेरी अपील है उनसे के चाहे एक लाइन में या चाहे कितने ही पन्नो में अपनी राय ज़ाहिर करे कि आज वो किसको समर्थन कर रहे है ? में उन साथियों को भी कहना चाहूँगा के अगर आपकी इन लोगो तक पहुँच है तो उनके पास जाकर उनकी राय जाने और लोगों तक पहुचायें।
शुक्रिया