कि
चाँद क्या है
किसी के लिए
सारा आसमान
चाँद है
और
किसी के लिए
बस एक नाम.…
Visual Storyteller, Video Journalist, and Documentary Filmmaker
दिल की, दिमाग की,
अपनों की गैरों की,
प्यार की, उस की
पर
वो बातें सिर्फ
जबां पर होती है
लबों पर नहीं
जबां चाहती है
सारे राज़ खोलना
पर
रोक लेते है
लब
लब
जो काम करते है
उस मखमली पर्दे का
जिसके
इस तरफ
चंद अल्फ़ाज़ों की
रंगीन दुनिया है
उस तरफ
(Saurabh Kumar)
या
मर जाना
आँखे बंद कर लेना
या
दुनिया को कभी न देखने की कसम खाना
बोलना भी नाज़ायज़ है
और
न बोलना भी
कुछ कहने को हुक्मरानों ने
लफ़्ज़ छोड़े नहीं
और
न कहे आँखों से आँसू
रुकते नहीं
यूँ तो खुदा और भगवान
पहले ही दफ़न हो चुके थे
पर
आज उसके बाशिंदों ने
कब्र से उसकी लाश को खींचकर
आसमान में तबियत से उछला है
रही सही कसर
आज पूरी हो गयी
न अब उस पर यकीं है
न उसके बाशिंदों पर
सच में
आज भर पेट गली देने
का मौका दिया है
उन मासूमों के नाम जो अंजान थे मरते दम तक हुकूमत और हुक्मरानो के नाम से।
(Saurabh Kumar)
इस दुनिया में,
इस देश में
चिल्ला-चिल्ला कर बोलना चाहता है
लेकिन
हर कोई बोलना या चिल्लना
आखिर क्यों चाहता है
किसके लिए
उस भीड़ के ,
उस दुनिया के शोर को
हम सुने
हम सब गूंगे और बहरे हो जाये
तो हर कश्मीरी
अपनी रूह के दर्द को ,
जोर-जोर से चिल्लना चाहता है
सबको अपना दर्द बतलाना चाहता है
क्या हम उसे सुने
तो हर फिलिस्तीनी
अपनी दर्दनाक कहानी
जोर-जोर से बोलना चाहता है
इस्राईल के मुखौटे को उखाड़ फैंकना चाहता है
मुट्ठी भर पत्थरों से करना चाहता है
किसके लिए सुने
दूसरों की आफत और परेशानियों को हम क्यों ढोये
अच्छा तो ये है की हम सब गूंगे और बहरे हो जाये
इस फालतू दुनिया के जाल से मुक्त होकर
अपनी एक खुबसूरत दुनिया बसाये
और बस
सभी तस्वीरें साभार गूगल…
न ये रात है
ये
समुंद्र का तय किया
वक़्त है।
आते है इस वक़्त
हज़ारों लोग
लिए
प्यार, गुस्सा, तकलीफ, बैचेनी
और भी न जाने
क्या-क्या ?
देखते है
लहरों को ऊँचा उठता
और ऊँचा
और
भूल जाते है
हर एक चीज़
जिनसे है उनका नाता
खो जाते है
इन लहरों में।
लिखते है
इन बत्तियों को ओट में
जो लगी है
सड़क के बीचो-बीच
रात
पूरी रात
जलती।
न ये रात है
ये
समुंद्र का तय किया
वो कहते है तस्वीर लो,
दीवारों की, पेड़ों की,
परछाई की
हर एक उस चीज़ की
जो खीचती है तुम्हे
अपनी और
पर
मैं कैसे कहूँ
कि मुझे खिचती है
वो धरती
जो अब नेस्तनाबूत हो गयी है
बांध परियोजना के कारण,
खींचती है वो माँ
जिसका बेटा न तो फौज में था
और
न ही ज़िहादी था,
वो था तो बस एक अदना सा किसान
जो अपनी ज़मीन
न बचा पाने के कारण
चढ़ गया फाँसी पर,
और
छोड़ गया अपने पीछे कई गीली आंखे,
खीचते है वो हज़ारों हाथ
जो न तो देश के लिए उठे थे
और
न ही जन गन मन के लिए
वो उठे थे तो बस
अपनों की सलामती के लिए
और
अपने आशियाने के लिए
लेकिन वो अब कभी न उठ सकेंगे
चूँकि
या तो वो मोड़ दिए गये है
या तोड़ दिए गये है,
खीचते है वो शरीर
जिनको पहले लुटा खसोटा गया
फिर छोड़ दिया गया
अदालतों के चक्कर काटने को
वो कहते है कि तस्वीर लो
जो तुम चाहते हो उसकी
कैसे कहूँ कि हाथ कांपते है मेरे
कैमरा पकड़ने में
चूँकि
दीवारों, पेड़ों, परछाई
हर एक चीज़ में
दिखाई देती है मुझे
अपनी और खीचने वाली
तस्वीरें।

मुझसे कहा था
किसी ने
कि एक माँ को
प्रसवपीढ़ा में
होता है
सर्वाधिक कष्ट
लेकिन
मैं नहीं मनाता
चूँकि
पीढ़ा सिर्फ
शारीरिक रूप से नहीं होती
यह पीढ़ा तो
एक बार शिशु को जन्म दे कर
चली जाती है
लेकिन
एक माँ के लिए
अपने बच्चे से
वियोग का हर एक क्षण
होता है
सर्वाधिक कष्टदाय
यह कोई कविता नहीं
अश्रु है मेरी माँ के
जो हमेशा मेरे उससे दूर होने पर
टपक पड़ते है अपने आप ही
माँ
तुझे मैं बतला नहीं सकता
कि क्या है तू मेरे जीवन में
सोचता हूँ
जब भी टी.वी. या अख़बार से
पता चलता है मातृ दिवस के बारे में
मैं रुक जाता हूँ
चूँकि
एक दिन का रिवाज़
मेरे हर क्षण को नहीं बतला सकता तुझे
तू जो है मेरे जीवन में शायद ही कोई हो
ये कविता भी तुझे
शायद ही कभी पढ़कर
सुना सकूँ
चूँकि
कुछ क्षण ही
तो ला सका हूँ
इसमें मैं
और
तू
तू तो
ब्रह्मांड है
अनंत,
माँ…
सभी फ़ोटो साभार आरजू सिद्दकी(The Pixels Art)…
गत 9 मई को दिल्ली विश्वविधालय के रामलाल आनंद कॉलेज से साईबाबा की जिस तरह फ़िल्मी अंदाज़ में गडचिरोली पुलिस ने गिरफ़्तारी की वो सरल शब्दों में अगर कहा जाये तो किसी भी नज़र में गिरफ़्तारी कम अपहरण ज्यादा थी। इस प्रकरण ने एक बार फिर हमारी सरकार, सुरक्षा प्रणाली और नाम मात्र की रह गई लोकतंत्र व्यवस्था का मुखोटा उखाड़ फैंका है। साईबाबा की गिरफ़्तारी ने उस मुहीम को और तेज़ कर दिया जो खिलाफ है –
शहरी ग्रीन हंट के
बुद्धिजीवी तबके, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी के
भूमि अधिग्रहण के
किसानों के शोषण के
पूंजीपतियों के विकास रूपी जाल के
और हर उस दमनकारी कानून के जो खासकर बनाया ही गया है मजदूरों और आम जन के खिलाफ़।
साईबाबा की गिरफ़्तारी ने उस तबके को और भी सक्रिय कर दिया है जो इस मुहीम में पिछले काफी समय से लगा हुआ है और इस गिरफ़्तारी ने हेम मिश्रा, प्रशांत राही और उन सभी राजनैतिक कैदियों की रिहाई की अपील को और भी तेज़ कर दिया है।
21 मई की दोपहर दिल्ली विश्वविधालय के कला संकाय के बाहर इसी कड़ी में कई राजनैतिक और छात्र संघठन एकजुट हुए और लगभग 3 घंटे तक प्रदर्शन किया और साईबाबा और अन्य राजनैतिक कैदियों की रिहाई साथ ही दमनकारी कानूनों के बारे में अपनी-अपनी राय रखी।
इस प्रदर्शन में निम्नलिखित संघठनों ने हिस्सा लिया –
AIDSO, AIFRTE, AISA, AISF, CFI, CTF, Disha, DSU-DU, DTF, FDS, JSM, KYS, Nawruz, NSI, PACHHAS, Sambhavana, SIO and SFI
इस प्रदर्शन में साईबाबा की पत्नी ने उनके संघर्ष की कहानी को बयाँ किया जो अपने आप में वहाँ जुटी भीड़ के मायने अपने आप समझा रही थी। यहाँ आया हर संघठन जहाँ एक और साईबाबा की रिहाई के लिए ऐसे आंदोलनों पर जोर दे रहे थे वही दूसरी और UAPA और AFSPA जैसे काले कानूनों के खिलाफ भी खुलकर बोल रहे थे। यहाँ आर.एल.ए. कॉलेज में साईबाबा के सहायक शिक्षको और छात्रों ने भी अपनी बात रखी और इस तरह के प्रदर्शन और कॉलेज के अन्य शिक्षको और छात्रों से मिलकर इस आन्दोलन की जरुरत के बारे में बात करने की अपील की। एक साथी ने अपने वक्तव्य में ये साफ कहा कि वह साईंबाबा की रिहाई के इस आंदोलन में इसलिए साथ नहीं है क्योंकि वो 90 प्रतिशत विकलांग है बल्कि वो उनके द्वारा किये गए कार्यो की वजह से इस आंदोलन के साथ है और साईंबाबा के साथ-साथ हर उस व्यक्ति की रिहाई की अपील करता है जो इन दमनकारी कानूनों की वजह से बंदी बना लिए गये है।
इसके साथ ही वहाँ हिंदी और अंग्रेजी में एक पर्चा भी बाँटा गया जो कुछ इस तरह है –
जी एन साईबाबा के समर्थन में एकजुट दिल्ली विश्वविद्यालय समुदाय
गत 9 मई 2014 को रामलाल आनंद कॉलेज में अंग्रजी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत डॉ जी एन साईबाबा को गडचिरोली पुलिस ने दिल्ली विश्वविधालय परिसर से “गिरफ्तार” कर लिया और उन्हें हवाईजहाज से तुरंत गडचिरोली ले जाया गया जहाँ उन्हें रिमांड पर 14 दिनों तक हिरासत में रखा गया है।
डॉ साईबाबा पोलियो उपरांत पांव के पक्षाघात से पीड़ित है और 90% विकलांगता के शिकार है। वह ह्रदय के रोगी है और उच्च रक्तचाप एवं स्पाइनल दर्द से भी आहत है। पुलिस के डॉक्टर ने भी उनके ख़राब स्वास्थ्य को प्रमाणित किया है और इलाज की सलाह दी है। इसके बावजूद उन्हें रिमांड पर न्यायिक हिरासत में रखा गया और एक छोटे से अंडाकार सेल में एकांत कारावास में रखा गया जहाँ इलाज और शारीरिक सहायता का कोई इंतजाम नहीं था। बताया जा रहा है कि वो अत्यधिक शारीरिक कष्ट और मानसिक पीड़ा की स्थिति में है।
डॉ साईबाबा की हिफाज़त और गरिमा की फ़िक्र किये बिना उनकी गिरफ़्तारी अपहरण की भांति है। चूँकि वो व्हील चेयर पर चलने को बाध्य है, उनके भागने की कोई गुंजाईश नहीं थी। फिर उनकी गिरफ़्तारी ऐसे क्यों की गयी? इरादा उन्हें हिरासत में लेने का नहीं था बल्कि उन्हें वांटेड अपराधी के रूप में प्रचारित करने का था। इसके बाद उन्हें अवैधानिक रूप से टार्चर किया गया ताकि उन्हें मानसिक रूप से कमज़ोर किया जा सके और उनसे बेबुनियाद इलज़ाम उगलवाये जा सके।
डॉ साईबाबा ने विश्वविधालय के बाहर और भीतर जनवादी आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है और वो वंचितों और जरूरतमंद के अधिकारों के अधिकारों के लिए हमेशा आवाज़ उठाते रहे है। वो दिल्ली विश्वविधालय के महत्वपूर्ण और जिम्मेदार सदस्य है और अपने छात्रों के बीच अत्यधिक मशहूर शिक्षक है। उनको साहित्य पढने, पढ़ाने और शोध करने में विशेष अभिरुचि है। वो एक विद्वान भी है जिसने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जगहों पर व्याख्यान और वार्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की है। गिरफ़्तारी के समय में भी वो दो पेपर के शीर्ष परीक्षक थे और उत्तरपुस्तिका के मूल्यांकन के व्यवस्था के लिए जिम्मेदार थे। विडंबना है कि उनकी सेवाओं के बावजूद उनके साथ ऐसा दुखद बर्ताव किया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में विश्वविधालय की स्वायत्तता पर प्रशनचिन्ह उठता है और विश्वविद्यालय की स्वतन्त्र विचारो के आदान प्रदान के केंद्र के अवधारणा को भी धक्का पहुचाता है। एक बात तो साफ है कि डॉ साईबाबा के जनवादी आन्दोलनो से जुडाव होने के कारण उन्हें यह सजा दी जा रही है। ये उन लोगों के लिए भी एक चेतावनी है जो मुक्त सोच और असहमती व्यक्त करने से नहीं झिझकते। डॉ साईबाबा को इस हालात में रखने के पीछे कोई वैधानिक अथवा तार्किक औचित्य नहीं है विशेषकर जब उन्होंने जाँच में राज्य एजेंसियों की पूरी मदद की है और अपनी बेगुनाही साबित करने की पूरी कोशिश की है। अत: हम सभी जनवादी आवाजों से आह्वान करते है कि वो इस गिरफ़्तारी की पुरजोर भर्त्सना करे, इसके खिलाफ विरोध में शामिल हो, और डॉ साईंबाबा को तुरंत बिना किसी शर्त के बेल पर रिहा करने की मांग करे।
यू तो दलित अस्मिता पर कई लेख, कहानियाँ, उपन्यास और फ़िल्में पहले भी देख चुका हूँ, लेकिन कुछ दिन पहले हेबिटेट फिल्म महोत्सव में नागराज मंजुले की मराठी फ़िल्म फंड्री देखने का मौका मिला। फिल्म की शुरुआत से ही न जाने क्यों में उसकी तुलना ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा झूठन से कर रहा था। वही एक गाँव जो शायद वक़्त के थपेड़े खाकर क़स्बे में तब्दील हो गया था। वही ऊँची और नीची जात के लडको का साथ पढना। वही एक लड़का जो जात से तो नीच है लेकिन सपने एक ऊँची जात की लड़की संग पंख लगाये उड़ रहे है। तो बदला क्या है ?
समय, समय जो तक़रीबन 40 से 50 आषाड़ इस दुनिया को दे आया है। झूठन के मुख्य पात्र को शायद अपनी जात को ऊपर उठाना था और इसके इलावा उनके पास कुछ और सोचने का वक़्त ही नहीं था लेकिन फंड्री का वो लड़का अपने सपनो की रानी से बचपन वाला प्यार भी करना चाहता है, और लडको की तरह नई जींस भी पहनना चाहता है, सबसे बड़ी बात वो अपनी जात से ऊपर उठना चाहता है। और इन सभी के साथ वो एक गुलेल और अपने पक्के दोस्त संग हर रोज़ निकल पड़ता है शिकार पर, एक काली चिड़िया के शिकार पर जिसके बारे में उसने सुना है की उसको पकड़ने के बाद जो भी उसे जलाकर उसकी राख़ जिस किसी पर भी उडेलेगा वो उसके प्यार में पागल हो जायेगा।
फ़िल्म शुरू से अंत तक हर पक्ष में मुझे मजबूत दिखाई दी खासकर कई द्रश्यो में दर्शको को एकांत में लेकर खो जाना और वह अंतिम भाग जब उसे अपने ही स्कूल के सामने अपने पूरे परिवार संग न चाहते हुए भी मजबूरन सूअरों को पकड़ने के लिए जाना पड़ता है(शायद इसीलिए फ़िल्म का नाम फंड्री पड़ा)। जिसे वहाँ की ऊँची जाति के लोग अपनी पूजा में सबसे बड़ी बाधा मानते है। इस द्रश्य में उस लड़के का बार बार छिप जाना और कोशिश करना कि वो अपने स्कूल के किसी भी बच्चे के सामने न आये, दिल को बड़ा विचलित करता है सभी बच्चो का उसके पूरे परिवार का मज़ाक उड़ाना, जिनमे वो लड़की भी शामिल है जिससे वह एकतरफ़ा प्यार करता है। हमे भारत में जाति की उस कहावत को सच करती बताती है जिसके अनुसार ‘जाति वो है जो कभी नहीं जाती।’ लेकिन फिल्म अपना अंत उस अनंत पत्थर के साथ जाति प्रथा पर वो प्रहार करती है जो शायद ही कही और देखने को मिले। फिल्म का अंत कई माइनों में समाज को और उन सभी नीति निर्माताओं को अनंत यातनाओं का एक उपहार देकर जाती है जिसकी हमे तब तक जरुरत पड़ेगी जब तक की हम इस जात शब्द को वक़्त के आखिरी मुहाने पर न छोड़ आये।
वीरेन दा की ताजा कविताओं से मुलाकात
पिछले कई महीने से हिंदी के साहित्यिक समाज में चर्चा है कि वीरेन डंगवाल बीमार है। उनकी बदली हुई आवाज़ , चेहरे पर रेडिओथेरेपी के निशान इस बात की जरुर तस्दीक करते हैं लेकिन जब आप उनकी सेहत का हाल लेने के लिए उनके घर पहुंचते हैं तो २ घंटे की बातचीत के बाद पता चलता है कि आप वीरेन दा की बीमारी के बारे में कुछ नहीं जान पाये बल्कि वीरेन दा ही आपकी नौकरी , घर -बार , बीवी बच्चों के बारे में पूछते और ज़िंदगी को खूबसूरती से जीने के नुस्खे बताते रहे।
मैं भी चाहता हूँ कि अब आप भी वीरेन दा की ताजा कविताएँ सुनिये और उन्हीं की तरह ताजा रहने का नुस्खा हासिल करिये।
कविता
एक
पिछले साल मेरी उम्र ६५ की थी
तब मैं तकरीबन पचास साल का रहा होऊंगा
इस साल मैं ६६ का हूँ
मगर आ गया हूँ गोया ७६ के लपेटे में.
ये शरीर की एक और शरारत है.
पर ये दिल, मेरा ये कमबख्त दिल
डाक्टर कहते हैं कि ये फिलहाल सिर्फ पैंतीस फीसद पर काम कर रहा है
मगर ये कूदता है, भागता है, शामी कबाब और आइसक्रीम खाता है
शामिल होता है जुलूसों में धरनों पर बैठता है इन्कलाब जिंदाबाद कहते हुए
या कोई उम्दा कविता पढ़ते हुए अभी भी भर लाता है इन दुर्बल आखों में आंसू
दोस्तों – साथियों मुझे छोड़ना मत कभी
कुछ नहीं तो मैं तुम लोगों को देखा करूँगा प्यार से
दरी पर सबसे पीछे दीवार से सटकर बैठा.
दो
शरणार्थियों की तरह कहीं भी
अपनी पोटली खोलकर खा लेते हैं हम रोटी
हम चले सिवार में दलदल में रेते में गन्ने के धारदार खेतों में चले हम
अपने बच्चों के साथ पूस की भयावनी रातों में
उनके कोमल पैर लहूलुहान
पैसे देकर भी हमने धक्के खाये
तमाम अस्पतालों में
हमें चींथा गया छीला गया नोचा गया
सिला गया भूंजा गया झुलसाया गया
तोड़ डाली गईं हमारी हड्डियां
और बताया ये गया कि ये सारी जद्दोजेहद
हमें हिफाजत से रखने की थीं.
हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से
पंजर दबता जाता है उनके बोझे से
मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिए
ओ मेरी मातृभूमि, ओ मेरी प्रिया
कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं .
मैट्रो महिमा
पहली
सीमेन्ट की ऊंची मेहराब पर
दौड़ती रुपहली मैट्रो
गोया सींगों को तारों पर उलझाये हिरनी कोई .
मेरा मसोसा हुआ दिल
गोया एक हमसफ़र तेरा हमराह.
मुझे भी ले चल ज़ालिम अपने साथ
चांदनी चौक करौलबाग विश्वविद्यालय वगैरह
मेरे लिये भी खोल अपने वे शानदार द्वार
जो कभी बायें खुलते हैं कभी दायें सिर्फ आवाज़ के जादू से.
दूसरी
अस्पताल की खिड़की से भी
उतनी ही शानदार दिखती है मैट्रो
गोया धूप में चमचमाता एक तीर
या शाम में खुद की ही रौशनी में जगमगाता
एक तीर दिल को लगा जो कि हाय – हाय !
बेहतर हो चावड़ी बाज़ार उतरना और रिक्शा कर लेना बल्लीमारान गली कासिमजान के लिये.
तीसरी
दृश्य तो वह क्षणांश का ही था मगर कितना साफ़
वह छोटी बच्ची चिपकी हुई खिड़की से देखती मैट्रो से बाहर की दुनिया को
उसके पार पृष्ठभूमि बनाता
दूसरी खिड़की का संध्याकाश एकदम नीला
मुझे देखने पाने का तो उसका खैर सवाल ही क्या , पर मुझे क्या –क्या नहीं याद आया उसे देखकर
माफ़ करना ज़रूरी कामों जिन्हें गंवाया मैंने तुच्छताओं में
जिन्हें मुल्तवी करता रहा मैं आजीवन .
चौथी
हाय मैं होली कैसे खेलूँ तेरी मैट्रो में
तेरी फ़ौज पुलिस के सिपाही
ले लीन्हे मेरी जामा तलासी तेरी मैट्रो में
एक छोटी पुड़िया हम लावा
जैसे – तैसे काम चलावा
बिस्तर पर ही लेटे – लेटे खेल लिये जमकर के होली
आं – हां तेरि मटरू में .
पांचवीं
सुनुकसानम सुनुकसानम सुनुकसानम चलो नहाने
सुनुक सुल्लू छ तप्तधारा वसन्तकाले अति भव्यभूती
जब तुम राजीव चौक पहुँचो
हे अत्यन्त चपलगामिनी
तो कनाटप्लेस की समस्त नैसर्गिक तथा अति प्राकृतिक सुगंधियों को मंगवा लेना अवश्य
तुम्हारा कोई भी भक्त किंवा दास
यह कार्य सहर्ष कर देगा बिना किसी उजरत के
मध्य रात्रि के बाद जब मोटे – मोटे पाइपों की गुनगुनी धारा से भरपूर नहला दिये जाने के बाद
(ऐसे पाइप अब पुलिस के पास भी होने लगे हैं दंगा निरोधन के लिये )
जब तुम्हे टपटपाता हुआ और एकाकी छोड़ दिया जाय
उस नीरव रंगशाला में
तब तुम बिना झिझक अपनी अदृश्य सुघड़ बाहें उठा कर
कांख और वक्ष में जमकर लगा लेना उन सुगंधियों को
मानो अभिसार तत्परता के लिये
तथा
अपनी कांच से बनी सुन्दर आँखों से टिम टिम देखना अपना अप्रतिम सौंदर्य
जो सिर्फ इक्कीसवीं सदी में ही संभव था भारत में
अपनी वैधता और औचित्य प्रमाणित करने के लिये
इसीलिये अक्लमंद लुटेरे तुम्हे सबसे आगे करते हैं .
मार्च 13, 2014 , दिल्ली