काफी वक्त हो गया जब ये कहानी अपने दोस्तों की मदद से ज़बानी तौर पर रिकॉर्ड की थी।फ़िलहाल जो माहौल चल रहा है और जिस तरह हज़ारों बेगुनहा लोग भारतीय कारावासों में काले कानूनों के बिनाह पर बंद है, उसको देखते हुए लगा कि शायद इसको आप सभी के साथ साझा करने का वक़्त आ गया है। इन काले और दमनकारी कानूनों की चपेट में सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग ही नहीं बल्कि उसमे शामिल है अनगिनत आदिवासी, दलित और लगातार सरकार और पूंजीपतियों के शोषण का शिकार होता दबा-कुचला वर्ग। यहाँ मैंने अपने उन सभी साथियों का नाम नहीं दिया है जिन्होंने इसको रिकॉर्ड करने से लेकर अंत तक मेरा साथ दिया लेकिन वो जानते है कि फ़िलहाल चल रही राष्ट्रभक्ति की आबो-हवा के कारण ही मैंने ऐसा किया है। और मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब मुझे अपने किसी भी साथी का नाम छिपाने की जरुरत महसूस नहीं होगी।
By
Saurabh Bambaiya and friends.






