भगत सिंह, पाश, माओ

काफी वक्त हो गया जब ये कहानी अपने दोस्तों की मदद से ज़बानी तौर पर रिकॉर्ड की थी।फ़िलहाल जो माहौल चल रहा है और जिस तरह हज़ारों बेगुनहा लोग भारतीय कारावासों में काले कानूनों के बिनाह पर बंद है, उसको देखते हुए लगा कि शायद इसको आप सभी के साथ साझा करने का वक़्त आ गया है। इन काले और दमनकारी कानूनों की चपेट में सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग ही नहीं बल्कि उसमे शामिल है अनगिनत आदिवासी, दलित और लगातार सरकार और पूंजीपतियों के शोषण का शिकार होता दबा-कुचला वर्ग। यहाँ मैंने अपने उन सभी साथियों का नाम नहीं दिया है जिन्होंने इसको रिकॉर्ड करने से लेकर अंत तक मेरा साथ दिया लेकिन वो जानते है कि फ़िलहाल चल रही राष्ट्रभक्ति की आबो-हवा के कारण ही मैंने ऐसा किया है। और मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब मुझे अपने किसी भी साथी का नाम छिपाने की जरुरत महसूस नहीं होगी।

By
Saurabh Bambaiya and friends.

Kagaz ke Phool

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Abhi kuch din pahle hi to wo us pahelinuma kitab ki talash main idhar se udhar bhatak rha tha,
Pahli se dusri,
dusri se tisri manzil,
Na jane kya talash thi?
kadmon ki aahat main kuch ajib si hadbadi thi uske….
Shukriya Akash aur Mohini

Bastar “Mission 2016”

The Chhattisgarh government has launched ‘Mission 2016’ as trouble-free Bastar but who will it ‘trouble’ and who will it free? Isha Khandelwal, advocate and member of the Jagdalpur Legal Aid Group in Bastar, Chattisgarh, talks about the present situation in Bastar and how the state government is using the machinery of the law, judiciary and police against people in the name of the development. If anyone speaks of this, they are either killed, jailed or hounded out of Bastar. No one is safe in Bastar, no one is free!

बस्तर “मिशन 2016”
आज बस्तर को राज्य सरकार आदिवासी मुक्त स्थान बनाना चाहती है, जिसको नाम दिया गया है “मिशन 2016”| बस्तर के जगदलपुर लीगल ऐड ग्रुप में काम करने वाली ईशा खंडेलवाल बस्तर की वर्तमान स्थिति की बात कर रही है, कि किस तरह राज्य सरकार हर तरह के बल माने पुलिस मशीनरी, कानून और अन्य का प्रयोग विकास के नाम पर आदिवासियों के खिलाफ कर रही है| जो कोई बस्तर के बारें में बात कर रहा है वो यहाँ तो बस्तर से बाहर है या जेलों में बंद है अथवा मर चुका है| बस्तर में फ़िलहाल कोई सुरक्षित नहीं है|

तुम्हारी/मेरी दिवाली

अगर ये दिवाली
सिर्फ राम के नाम पर
तुम मनाते हो,

तो
मेरे दोस्त
ये दिवाली
तुम्हे ही मुबरखो

अगर ये दिवाली
तुम
सिर्फ और सिर्फ
जश्न के नाम
पर मनाते हो

तो
मेरे दोस्त
ये दिवाली
तुम्हे ही मुबरखो

अगर साल भर
इंतज़ार के बाद
जश्न मनाना ही मकसद है
तुम्हारी दिवाली,

अफरा-तफरी की ज़िन्दगी
से बचना
और धमाको के बीच
सुकून ढूँढना
ही दिवाली है

तो
मेरे दोस्त
ये दिवाली तुम्हे ही मुबरखो

मेरे लिए तो
बंद कमरे में
बैठना
खुद से बातें करना
और
साल भर की
गलतियों को
याद करना ही
दिवाली है

शायद
मेरी दिवाली
मुझे ही
मुबारक हो
और
तुम्हारी तुमको……

घुंटू-मुंटू 

“बच्चो को बहलाने का एक खेल जिसके तहत दादी लेटकर अपने दोनों घुटनों को मोड़कर मुझे बैठा लेती और झूले की तरह आगे पीछे झूलाते हुए एक छोटी सी काव्यात्मक कविता गाती जाती।

‘राजा रानी आवैली,
पोखरा खनावैली,
पोखरा के तीरे तीरे
एमिली लगावैली,
एमिली के खोढ़रा में बत्तिस अंडा,
रामचंद्र फटकारै डंडा,
डंडा गयल रेट में – मछरी के पेट में – कौआ कहे कांव-कांव
बिलार कहे झपटो
आ लकड़ी क टांग धेइके रहरी में पटको रहरी में पटको।’
murdhiya
यह कहानी खत्म होते ही दादी जोर जोर से ‘लला पला, लला पला’ कहते हुए पैरों पर बैठाये मुझे ऊपर हवा में उछाल देती।”
doc. tulsi ram
 28/मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन/मुर्दहिया/डॉ. तुलसी राम/राजकमल प्रकाशन
शुक्रिया मोहिनी, समाज के इस हिस्से को मुझसे साझा करने के लिए।

सबसे ख़तरनाक / पाश

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

Sabhar

Kavita Kosh

घास / पाश

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा

बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मेरा क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा

बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी…
दो साल… दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है

मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूँगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा ।

Sabhar Kavita kosh

  • Pash
    Born: September 9, 1950, Jalandhar
    Died: March 23, 1988, Jalandhar

अझूठा दिलासा

आप जब अपनी ही दुनिया में

इतने मशगूल हो जाये

कि

दिन-रात सिर्फ

अपने बारे में ही सोचे

अपने ही गोले में घूमें

अपने अनुसार

अच्छो को पुचकारें

और

बुरों को दुत्कारें

और तब

जब कोई मौका मिले

तो

अझूठा दिलासा और समर्थन दिखाकर

समाज में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएं

तो साहब

मैं तो कोशिश करूँगा

कि अगर गोले में रहूँ

तो अझूठ के पास भी न भटकूँ

और अगर बाहर रहूँ

तो….

इरोम

इरोम तुम्हारें लिए तो हर एक दिन नया है,

साल में एक दिन याद करके

मैं बाकि दिन तुम्हे नहीं भूलना चाहता…

लम्हे

लम्हे
ये लम्हे ही तो है
लम्हे
जो दिखाते है
सच

जीने का
मरने का
और
उन्ही लम्हों से
बाहर निकलने का…..

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