राष्ट्र मीडिया की चुप्पी और जनता की पहल; ‘पब्लिक बोलती’

पब्लिक बोलती, जनता से जनता तक

वैश्विक महामारी (COVID-19 ) के भारत मे दाखिल होने के बाद ऐसे कई अवसर आये जब केंद्र और राज्यों की सरकारों को सचेत हो जाना चाहिए था। लेकिन सत्ता और पूंजी को खोने के डर से तुरंत लिए जाने वाले सख्त कदम पीछे टलते रहे और जब महामारी काबू से बाहर हो गई तब केवल 4 घंटे के नोटिस पर पूरे देश मे तालाबंदी कर दी गई।

बदतर होते हालातों में जब देश की मीडिया को संयम से निष्पक्ष जानकारी देने की जरूरत थी तब वे अपना टीआरपी का न खत्म होने वाला खेल खेल रहे थे। लोग सोशल मीडिया का सहारा अपनी शिकायतों को दर्ज़ करने के लिए प्रयोग कर रहे थे, जो नाकाफ़ी था और इन सबसे दूर देश का सबसे बड़ा मजदूर तबगा सरकारी मदद की आस में खुद को घर मे कैद करके अपनी जमा पूंजी के खत्म होने का इंतजार करने लगा।

मीडिया हर रोज तालाबंदी के दिनों की संख्या टेलीविजन स्क्रीन पर दिखाता लेकिन मामूली सी जन स्वास्थ्य सेवाओं के ठप्प हो जाने से हो रहे ‘सरकारी हत्याओं’ को दिखाने से चूक जाता। उसके बाद लंबे समय तक इंतजार और भूख से बेहाल प्रवासी मजदूर, सड़कों पर हजारों किलोमीटर के अपने घर वापसी की अंतहीन यात्रा पर निकला। इन सभी हालातों में कुछ युवा साथियों ने एक दूसरे की मदद से “पब्लिक बोलती” नाम से एक मुहिम पर मुंबई शहर में काम शुरू किया।

पब्लिक बोलती अभियान, भारत के लोगों के लिए एक नागरिक पत्रकारिता और वकालत का मंच है। जिसे खासतौर पर COVID-19 महामारी से प्रभावित लोगों और उस दौरान घोषित राष्ट्रव्यापी तालाबंदी के कारण होने वाली समस्याओं को उजागर करने के लिए शुरू किया गया था। लॉकडाउन, जिसने देश को एक ठहराव में ला दिया और न केवल लाखों लोगों की आजीविका खत्म हुई बल्कि भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य सुविधा जैसी बुनियादी जरूरतें मानों गायब हो गई।

इस साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान दो पायदान गिरकर 142 वें स्थान पर आ गया। इस कारण मीडिया कर्मियों और देश भर में भारी सेंसरशिप के बढ़ते विरोध के साथ, स्वतंत्र और भरोसेमंद मीडिया प्लेटफार्मों की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।

PB Call

जनता की पहल जनता के लिए:

पिछले 3 महीनों में लगभग 17 विषयों पर 47 स्टोरी इस अभियान ने ऑडिओ-विसुअल माध्यम मे की है। 12 राज्यों से आये इन सभी मामलों में अधिकतर विषयों मे से कुछ पर राज्य और जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाई तो कुछ मे स्वतंत्र संस्थाओं का साथ इस अभियान को मिला।

मुहिम में शामिल साथियों की माने तो इस अभियान को शुरू करने का मसकद सिर्फ इतना था कि देशभर के नागरिक अपनी चिंताओं और परेशानियों को बेझिझक अन्य लोगों और जवाबदेह राज्य सरकारों के सामने रखे। मोबाईल फ़ोन से मिल रहे वीडियो संदेशों को बेहतर ढंग से संपादित कर, यह मुहिम देशभर में नागरिक पत्रकारिता के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रही है। आत्मनिर्भरता के नाम पर बेसहारा छोड़ दिये गए इस देश के नागरिक अपनी आवाज खुद बने यही वतर्तमान हालत की जरूरत भी है।

यहाँ प्राथमिक उद्देश्य उन आवाज़ों को बढ़ाना है जो प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। कमजोर समुदायों के मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करना अब जरूरी हो गया हैं। सरकारी अधिकारियों पर यह दबाव हो कि वो प्राथमिकता से जनमानस की समस्याओ को संबोधित करें। यह अभियान एक गैर-लाभकारी उपक्रम है जो पूरी तरह से विभिन्न व्यवसायों से संबंधित स्वयंसेवकों के एक समूह के नेतृत्व में काम कर रहा है। इस मुहिम को काम के लिए कोई फंड अथवा चंदा कही से प्राप्त नहीं हो रहा है। देशभर के नागरिकों तक पहुँच बनाने और जागरूकता फैलाने के लिए यह मुहिम विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में स्वयंसेवक साथियों को खोज रहा है और उसमें सफल भी हो रहा है।

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मुश्किल समय में नागरिक पत्रकारिता की जिम्मेदारी लेने वाले:  

दुनियाभर की जन स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहाल कर देने वाला ये वाइरस जब भारत में दाखिल हो रहा था तब देश के हर छोटे-बड़े मीडिया संस्थान की नजर केंद्र शासित सरकार द्वारा अमरीकी राष्ट्रपति की मेहमाननवाजी की तरफ थी। 30 जनवरी 2020 को केरल राज्य में पहला कोरोना संक्रमित व्यक्ति पाया जाता है और ठीक 24 दिन बाद भी चीन, इटली और स्पेन से आ रही भयावह खबरों को नजरंदाज करते हुए देशभर के न्यूज चैनल भारत सरकार के महिममंडन में लगे हुए थे।

जब बात अधिक बिगड़नी शुरू हुई तो मीडिया ने रुख बदला और डर को बेचना शुरू किया और जिसमें वो सफल भी रहे। बात सरकार के हाथ से निकली तो सोचे समझे बिना देश भर में तालाबंदी कर दी गयी। एक एक करके हर जरूरत की चीज आम जन से दूर होने लगी और सरकारी और निजी अस्पतालों के बंद होने पर सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा। शुरुआत से अब तक मुंबई शहर का महाराष्ट्र राज्य इस वाइरस की चपेट में सबसे ज्यादा रहा और यही से पब्लिक बोलती अभियान जैसी पहल की सोच भी निकली।

शहर मे प्रवासी भारतीय विभिन्न मुद्दों से परेशान थे जिनमे सबसे अहम बेरोजगारी, राशन और घर का किराया थे। इस पहल मे काम कर रहे साथी, एक दूसरे से इन विषयों को बार बार साझा कर रहे थे और खुद प्रवासियों द्वारा बनाए जा रहे वीडियो पर चर्चा करते हुए ये समझे कि इन सभी मजदूरों की समस्याओं को उनसे बेहतर और कोई नहीं बता सकता और व्हाट्सअप जैसे माध्यमों से आ रहे इस तरह के वीडियो अपने आप में समस्या को बताने के लिए काफी है।

स्वतंत्र पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और छात्रों की मदद से विषय की गंभीरता को देखते हुए मार्च के अंतिम सप्ताह में इस मुहिम पर काम होना शुरू हुआ और प्रभावित लोगों के माध्यम से आते संदेशों को व्यवस्थित ढंग से विभिन्न सोशल मीडिया के ठिकानों पर साझा करना काफी सफल रहा। अप्रेल के मध्य में वीडियो संदेशों की संख्या अधिक बढ़ी तो विभिन्न व्यवसायों में शामिल दोस्त और सोशल मीडिया से साथी भी मदद के लिए सामने आये।

लॉकडाउन की शर्त को मानते हुए इस अभियान में शामिल सभी साथी अपने घरों से ही विभिन्न स्तर पर अपना सहयोग देने लगे। जो लोग सामाजिक स्तर पर प्रवासी मजदूरों, प्रवसियों और जरुरतमन्द लोगों के संपर्क मे थे उन्होंने फ़ोन के माध्यम से वीडियो को सही ढंग से रिकार्ड और जानकारी के विवरण को और सरल बनाया। वीडियो आने के बाद उसे कम समय सीमा और अधिक जानकारी के साथ कैसे प्रस्तुत किया जाए इसमे मदद की कुछ वीडियो पत्रकारों, स्वतंत्र फ़िल्मकारों और छात्रों ने बाकी सोशल मीडिया पर जनता की आवाज को और बुलंद करने और जल्द से जल्द मदद मिलने का जिम्मा देशभर के नागरिक, पत्रकार और छात्र बिना किसी स्वार्थ के उठा रहे है।

मुंबई, महाराष्ट्र से बाहर कई राज्यों में यह अभियान आम जनता की मदद करने की कोशिश मे लगा है। देशभर की प्रांतीय भाषाओं को प्राथमिकता देकर अंग्रेजी भाषा की मदद से कई महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक जानकारी और खबरें बाहर आ रही है। वर्तमान में देश के नागरिक जिन परिस्थितियों में है भविष्य में उनका रूप क्या होगा कहना मुश्किल है लेकिन नागरिक पत्रकारिता की यह पहल अगर यूँ ही चलती रही तो आशा है कि कई जान बचना मुमकिन होगा और देशभर में समन्वय और समानता भी बढ़ेगी।

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पब्लिक बोलती अभियान के विभिन्न सोशल मीडिया का पता:

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@PublicBolti

Public Bolti is a volunteer-led initiative to highlight disruptions caused by the Coronavirus lockdown.
If you are facing any difficulties with essential rations, emergency services, responses by police or government officials, send us a video/photo via phone or email. Tell us what the situation is like in your area.
We will inform the nearest agencies concerned and amplify your voice on social media.
We are currently operating in eight Indian languages: Hindi, English, Tamil, Malayalam, Telugu, Kannada, Marathi, and Bengali.
🔹While shooting, just make sure to:
▪️Make a video of the problem with the relevant details.
▪️Mention the date and location.
▪️Get in touch with us in case of any problems.

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Shaheen Bagh Protest

Shaheen Bagh had emerged as the epicenter of anti-CAA protests in the country. Thousands of women along with their children were sitting on a protest here since December 15 against the CAA, NRC and NPR. The site was cleared on March 14 amid the coronavirus lockdown in the national capital.

Communal riots broke out in the Capital on February 24 this year and had claimed 52 lives and left scores injured. Delhi Police has submitted around 80 chargesheets against around 600 people so far.

In a chargesheet filed against suspended AAP councilor Tahir Hussain, Delhi Police have mentioned the owner of Al-Hind hospital, which had provided emergency treatment to several victims during the Northeast Delhi riots.

A social worker DS Bindra, who actively participated in the Shaheen Bagh protests, has been mentioned in a chargesheet recently filed by Delhi Police in connection with North-east Delhi riots.

#ShaheenBagh #Jafrabad #Seelampur #Delhi #Riots #Communal #Frenzy #Protest #CAA_NRC_NPR #NPRisNRC #NPR #NRC #CAAProtests #CAA #IndiaAgainstCAA #NRC_CAA_Protests #NRC_CAA #IndiaRejectsCAB #CAA_NRC #CAA_NRC_Protests #IndiaRejectsNRC #IndiaAgainstCAA_NPR_NRC

जुलमतों के दौर में – सिनेमा

“1969 में दस्तावेज़ी सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना हुई। इस साल अर्जेंटीना के क्रन्तिकारी फ़िल्मकार ‘फर्नान्डो सोलानास’ ने वहां के मुक्ति संग्राम को ध्यान में रखकर 4 घंटे की दस्तावेज़ी फिल्म ‘द ऑवर ऑफ़ द फरनेस’ (The Hour of the Furnace) बनाई। इस फिल्म के प्रीमियर के अवसर पर फ्रेंच न्यू वेव के मशहूर फ़िल्मकार ‘गोदार्द’ ने सोलानास का रेडियो इंटरव्यू लिया। इस इंटरव्यू के दौरान बहुत सी खास बातों के बाद जब पलट का सोलानास ने गोदार्द से सवाल किया कि ‘क्या आपको अब फिल्मे बनाने के लिए प्रोडूसर मिलते है?’ तब गोदार्द ने बड़े मार्के की बात कही। उन्होंने कहा ‘फिल्मो के लिए तो नहीं लेकिन हाँ, मैने अब वीडियो फॉर्मेट पर काम करना शुरू कर दिया है। मैंने इस साल वीडियो पर चार फिल्मे बनायीं।’ इसी इंटरव्यू में वह आगे कहते है कि ‘हमे कैमरे का इस्तेमाल वैसे ही करना चाहिए जैसा वियतनामियों ने अमरीका से युद्ध लड़ते वक़्त साइकिल का किया।”

इस साक्षात्कार के 50 वर्षों के बाद, जब दुनिया भर में हम अपनी नज़रें दोड़ाते है और विभिन्न जन आंदोलनों को खंगालने की कोशिश करते है तो जन सिनेमा के नाम पर या यूं कहे कि दस्तावेजीकरण की परिक्रिया के तहत बेहद ही महत्वपूर्ण सामग्री का निर्माण हम अपने आस पास होता हुआ पाते है। दो दशक पहले तक वीडियो निर्माण और उससे संबंधित काम काफी मुश्किल भरा और पेचीदा हुआ करता था जो अब बेहद ही आसान हो चुका है। पहले एक पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो लेने के लिए हमे फ़ोटो स्टूडियो तक जाना पड़ता था और अब देश-दुनिया, गाँव-कस्बों में लोग मल्टीमीडिया मोबाईल फोन की मदद से भिन्न-भिन्न विषयों पर विडिओ बनाकर एक दूसरे का मनोरंजन करते है।

न सिर्फ मनोरंजन बल्कि इंटरनेट पर विभिन्न विषयों पर उपलब्ध सामग्री आम जनता के लिए सीखने-सिखाने का साधन भी बन चुकी है। अब सबसे बड़ी समस्या जो आती है वो ये कि लाखों-करोड़ों वीडियो मे अपने काम की चीज को कैसे खोज जाए? दूसरा ये कि जो हम इंटरनेट पर देख रहे है क्या वास्तव में उसपर विश्वास किया जा सकता है या नहीं? सवाल काफ़ी है लेकिन उनके जवाब मिलने के जगह हर मिनट हमे एक और अनचाहा वीडियो अपनी टाइमलाइन पर दिख जाता है। कभी हम खुशी-खुशी उसको आगे बढ़ा देते है तो कभी अनदेखा कर हम खुद आगे बढ़ जाते है। खुद और सामने वाले से सवाल करने का अभ्यास जैसे हम सभी भूल चुके है। अगर कोई हिम्मत दिखाता भी है तो उसको ‘सवाल न करने देने वालों की फौज’ मतलब ट्रोलस गालियों के बमवर्षा वाले कमेंट्स से चुप बिठाने की हर संभव कोशिश करती है। एक वक़्त था जब अखबार में लिखा सच समझा जाता था और अखबार के संपादक सच को छापना अपनी जिम्मेदारी मानते थे। एक आज का समय है जब व्हाट्सअप पर गाय के नाम पर फैली किसी अफ़वाह को आधार मानकर किसी व्यक्ति विशेष को मार दिया जाना न्यायोचित ठहराया जा रहा है, क्योंकि अखबार व्यवसाय बन गया और जनता भीड़! 

वर्तमान में सरकार द्वारा लाई जा रही जनता विरोधी नीतियों के आस पास भी हमे कुछ इसी तरह के अनुभव देखने को मिलते है जहां सरकारी तंत्र पूँजीपतियों/कॉर्पोरेट घरानों के साथ मिलकर महंगे और लुभावने वाली वीडियो सामग्री के साथ जनता को गुमराह करने की हर संभव कोशिश कर रहा है। वही दूसरी तरफ छात्रों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकार अभी तक सवाल करने वाला एक वर्ग इन गतिविधियों के खिलाफ़ लोहा ले रहा है।

विरोध की आवाज को और बेहतर समझने के लिए जरूरी है कि हम इतिहास मे दर्ज़ गतिविधियों को देखे और उनसे सिख ले जिनको सिनेमा, संगीत, डॉक्यूमेंटरी और अन्य विधाओं के रूप मे सँजोया गया और वर्तमान में इंटरनेट के माध्यम से आसानी से खोजा जा सकता है।

इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए प्रतिरोध का सिनेमा अभियान और चलती तस्वीरें के साथ मिलकार इंटरनेट पर मौजूद कुछ सामग्री को आप सभी के साथ साझा कर रहे है।

गीत-संगीत

 

हम देखेंगे 

Iqbal Bano sang it to a full house at Lahore’s Alhamra Arts Council in 1985 at the Faiz Foundation annual event.

उर्दू काव्यशास्त्र में मज़मून (कंटेंट) और मानी (मीनिंग) में फर्क किया गया है। इसे समझने के लिए हमें ‘गुबारे- अय्याम’ में संकलित ‘तराना-2’ (1982) सुनना/पढ़ना चाहिए जिसे फै़ज़ ने जनरल ज़िया-उल-हक़ की सैनिक तानाशाही के जमाने में लिखा। बताया जाता है कि उस समय पाकिस्तान में जनरल ज़िया ने इस्लामीकरण की मुहिम के तहत औरतों के साड़ी पहनने पर रोक लगा रखी थी। कहते हैं कि इस रोक के खिलाफ प्रतिरोध के बतौर काली साड़ी पहनकर इकबाल बानो ने एक लाख की भीड़ में इसे गाया। तराना जनगीत है। फै़ज़ इसे ‘जन-प्रतिरोध के गीत’’ की विधा के बतौर विकसित करते हैं। साभार जनमत 

गांव छोड़ब नाही

2010। हिंदी। 5 मिनट | म्यूजिक वीडियो
निर्देशक: के.पी ससी

भगवान माझी के एक आदिवासी गीत से प्रेरित यह तेजस गीत आदिवासियों के लिए अपनी ज़मीन बचाने का एक आहवान है। यह म्यूज़िकवीडियो सरकार और कॉर्पोरेट की ताक़तों के ज़ुल्म को बखूबी दर्शाता है।यह आदिवासी समुदायों से जंगलों, नदियों और गाँवों के लिए एकजुट होकर लड़ाई करने की गुहार करता है, जहां वे सदियों से शांति से रह रहे हैं।

Gaon Chhodab Nahi

2010| Hindi| 5 mins
Directed by K.P Sasi
Inspired by a tribal song, by Bhaghwan Maaji, this energetic upbeat film is a clarion call to tribals to hold on to all that belongs to them. It urges indigenous communities to unite and fight for forests, rivers and villages where they have been living peacefully for centuries.

 

भगत सिंह तू ज़िंदा है

2012। हिंदी। 4 मिनट
गायक: शीतल साठे

यह सामूहिक गीत भारतीय पूंजीवादी राजनीति के शोषणकारी और अपमानजनक चरित्र और धर्म, जाति, समुदाय और लिंग के आधार पर हमारे विवेक पूर्ण समाज के बारे में है।

Bhagat Singh Tu Zinda Hai

3| Hindi | 4 Mins
Sung by Sheetal Sathe
This mass song is about the exploitive and despotic character of Indian bourgeois politics and our discriminative society based on religion, caste, community and gender.

फैन बाबा साहेब दी
2016 | पंजाबी | 3 मिनट | म्यूजिक वीडियो
संगीतकार: गिन्नी माही
इस वीडियो में निर्देशक संगीतकार की पहचान का जश्न मनाता है और स्पष्ट करता है कि कैसे, एक युवा दलित महिला के रूप में, उन्हें सुनने की जरूरत है।

Fan Baba Saheb Di

2016| Punjabi| 3 Mins
Song by Ginni Mahi
In this music video the director celebrates her identity and how she, as a young Dalit woman, needs to be heard.

कोडैकनाल वोन्ट

2015। इंग्लिश। 3 मिनट | म्यूजिक वीडियो
निर्देशक: राथिन्द्रण आर. प्रसाद
रैप: सोफिया अशरफ
यह वीडियो यूनिलीवर द्वारा कोडैकनालमें किये गएमरक्युरी संदूषण और थर्मामीटर फैक्ट्री से प्रभावित मजदूरों को मुआवज़ा देने पर आलोचनात्मक निंदा है।

Kodaikanal Won’t

2015| English| 3 Mins
Lyrics by Sophia Ashraf
Directed by Rathindran R Prasad
The video takes an undisguised jab at Unilever for its failure to clean up mercury contamination or compensate workers affected by its thermometer factory in Kodaikanal.

नियमराजा का विलाप

सुनो रे भाई! अकथ कहानी…

सूर्य शंकर दाश की लघु फिल्म ‘नियमराजा’ के विलाप के रूप में यह गीत ओडिशा में विकास से उपजी पीड़ा को बयान करता है।

The Lament of Niyamraja

Bard, mystic, healer, medicine man & late leader of the Dongria Kondh, Dambu Prasaka, sings the song of Niyamgiri.

Displacement Colony by Surya Shankar Dash | 03:30 Minutes

Welcome to Odisha’s Biggest Housing Project!

Shot Dead for Development by Surya Shankar Dash | 01:03 Minutes

An animation depicting the Adivasi (Original inhabitants of the land) life in Orissa and their anti-mining struggles. The artist pays tribute to the men, women and children who have been shot dead by the police since 2001 for resisting mining and industrial activities on their land in Kalinga Nagar and Kashipur. The illustrations are in Idital (Saora Adivasi art) and music is from the Koya and Bonda Adivasi.

आज़ादी गाना

2016। हिंदी। 5 मिनट | म्यूजिक वीडियो
मलयालम गीतकार पुष्पवती पॉयपदाथु का यह गाना जे.एन.यू के छात्र नेता कन्हैया कुमार के आज़ादी नारों पर आधारित है।

Azadi

2016| Hindi| 5 Mins
Song by Pushpavathy
Malayalam singer Pushpavathy Poypadathu song ‘Azadi’ revolves around JNU student leader Kanhaiya Kumar’s ‘Azadi’ slogans.

फीचर फिल्में, डॉक्यूमेंटरी और अन्य 

मै तुम्हारा कवि हूँ 

2011| हिंदी| 40 मिनट| डॉक्यूमेंटरी
निर्देशक: नितिन के. पमनानी

यह फ़िल्म कवि रामशंकर यादव “विद्रोही” के बारे में हैं,एक ऐसे क्रांतिकारी कवि जिसने जीवन की सभी विलासिताओं को त्यागकर आम जन का कवि बनना पसंद किया|

I am Your Poet

2015| Hindi| 40 Mins| Documentary

This film was to be on a poet and his poetry. It became a story of a person who lives a poem. We try to understand the person we see the poem, we try to understand the poetry; the poet comes and stands in front of us. And as we journey through the poetry and the poet, we end up with a mirror. In the mirror, a roughly-hewn life, small, innocent…. a dream-like existence, in the scrub forest, among the silent ruins, the old streets in the middle of the polis. The poetry slowly shows us the way, and the way slowly becomes poetry Ramashankar Vidrohi has never written poetry, he speaks out poetry. He is a poet of our unknown, unorganized, underground nation. He is the poet of those whose constituency is always bearing the cost of empire builders, the women, the children, and the billions who lie on the steps to the center of the power structure.

मॉडर्न टाइम्स

1936| अंग्रेजी |87 मिनट | काल्पनिक कथा
निर्देशक: चार्ली चैपलिन

बीसवीं सदी के शुरुआत में बनी यह फ़िल्म, एक फैक्ट्री कामगार की कहानी है। इसमें दिखाया गया है कैसे तेज़ी से बढ़ती इस दुनिया में इंसान पीछे छूट रहे है। चार्ली चैपलिन के अनोखे अंदाज़ से भरी हुई यह फ़िल्म दर्शको को हसने और सोचने पर मजबूर कर देती है|

Modern Times

1936| English| 87 minute
Written and Directed by Charles Chaplin

Written and directed by Charlie Chaplin
Made in the early twentieth century this is the story of a factory worker struggling in a rapidly industrialising and exploitative world. Filled with Chaplin’s characteristic humour the film has allowed it’s viewers an opportunity to laugh and think at the same time; for many years.

नाता

2003। हिंदी। 45 मिनट | डॉक्यूमेंटरी
निर्देशक: अंजलि मॉन्टेरो और के.पी जयशंकर

‘नाता‘ भाऊ कोरडे और वक़ार खान, दो शांति कार्यकर्ताओं और अच्छे दोस्तों के बारें में है|ये दोनों एशिया की सबसे बड़ी ‘बस्ती’ धारावी में संघर्ष-समाधान पर काम करते है। इन दोनो दोस्तों के माध्यम से यह फ़िल्म शांति और साम्प्रदायिक समानता के बारे में बहुत कुछ दर्शाती है।

Naata

2003| Hindi| 45 Mins
Directed by Anjali Monteiro and KP Jaisankar

Naata is about Bhau Korde and Waqar Khan, two activists and friends, who have been involved in conflict resolution, working with neighbourhood peace committees in Dharavi, reputedly, the largest ‘slum’ in Asia.

सुपरमैन ऑफ़ मालेगाव

2008। हिंदी। 96 मिनट| डॉक्यूमेंटरी
निर्देशक: फ़ैज़ा अहमद खान

मालेगाव महाराष्ट्र का एक छोटा सा शहर है जो सांप्रदायिक तनाव और गरीबी से पीड़ित है। वहां के लोगो के लिए फ़िल्में कुछ घंटो के लिये एक शांति और ख़ुशी की दुनिया तक जाने का माध्यम है। यह देखकर वहा के कुछ लोगो ने अपनी खुद की फ़िल्में बनानी शुरू कर दी।पहली बार एक सुपरहिरो फ़िल्म बनाने की राह पर है और यह फ़िल्म इसी फ़िल्म समूह की खुशहाली और प्रेरणादायक आशाओं का पीछा करती है।

Supermen of Malegaon

2008| Hindi| 96 Mins
Directed by Faiza Ahmed Khan

Malegaon is a small town in Maharashtra which is fraught with communal tension and economic inequality. For the residents in Malegaon films provide an escape route to a world of peace and happiness. This has to lead a group of people who have started making their own films. The film follows the joyful and inspiring pursuit of this group to make a superhero film for the first time.

एक मिनट का मौन

1997। हिंदी। 60 मिनट | डॉक्यूमेंटरी
निर्देशक: अजय भारद्वाज

यह फ़िल्म चंद्रशेखर नाम के एक राजनैतिक कार्यकर्ता के बारे में है जिसने एक न्यायोचित दुनिया बनाने के लिए अपना जीवन त्याग दिया। कई लोग बहुत दूर दूर से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ने आते हैं लेकिन चंद्रशेखर जे.एन.यू से बिहार के सिवान नामक गांव गए जहां उन्होंने ग़रीबों के साथ काम करना शुरू किया। 31 मार्च 1997 के दिन, जे.पी चौक पर आयोजित मीटिंग में बिहार के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भाषण देते हुए उनको एक राजनैतिक दल के गुंडों ने मार दिया।

Ek Minute Ka Maun

1997| Hindi| 60 Mins
Directed by Ajay Bhardwaj

Chandrashekhar, who lived and died for practicing his belief for a just world. While many come from far-flung places to JNU, Chandrashekhar went from JNU to Siwan, to organize the rural poor. Chandrashekhar was addressing a street corner meeting at JP chowk in Siwan on the democratic rights of the people of Bihar, when goons sent by Shahbuddin, the RJD MP from Siwan, killed him on 31 March 1997.

तुरुप/ एकतारा कलेक्टिव/ हिंदी- अंग्रेजी सब-टाइटल्स/ फ़ीचर फ़िल्म/ 2017/ 72 मिनट

एकतारा कलेक्टिव की नयी फ़िल्म ‘तुरुप’ सिनेमा हाल में चलने वाली आम मुम्बईया फ़िल्मों से मामूली सी कम अवधि की यानि 71 मिनट की है. यहाँ अवधि पर विशेष जोर देना इसलिए है क्योंकि इस वजह से यह कथा फ़िल्मों के आम दर्शकों तक भी अपनी पहुँच बना सकेगी. तुरुप की कहानी और उसका सिनेमाई ट्रीटमेंट दोनों ही बहुत खास है शायद इसलिए यह नए सिनेमा की महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित होगी. यह एक आम क़स्बे की कहानी है जिसमे किसी तरह गुजर –बसर करने वालेलोग हैं जिनके लिए शतरंज की एक बिसात खेल लेना ही बहुत बड़ी बात है. क़स्बे के चक्की चौराहे पर एक एक चबूतरे के नीचे फ़र्श पर बकायदा एक शतरंज बना हुआ. इसी के बहाने पूरे क़स्बे की जुटान होती है. तिवारी जी और माजिद इस क़स्बे के सबसे उम्दा खिलाड़ी हैं. तिवारी जी शतरंज के अलावा हिन्दू राष्ट्रवाद की बिसात बिछाने में भी जुटे हैं. माजिद ड्राइवर है और क़स्बे की ही दलित लड़की लता से प्रेम करता है. लता अपनी छोटी सी नौकरी के जरिये अपने बीमार बाप और छोटे भाई की भी गुजर बसर करती है. तिवारी के लोग हिन्दू राष्ट्रवाद के पतीले को सुलगाने में लगे हैं. इसलिए तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध को पसंद नहीं करता और एक दिन चाय की दुकान पर माजिद के साथ जबरदस्ती करते हुए उसे इस क़स्बे को छोड़ने की चेतावनी देता है. माजिद कहीं और से इस क़स्बे में कमाने आया है. लेकिन सभी कहीं न कहीं से कमाने आये हैं यह ख़ास डायलाग एक आम आदमी शतरंज के खेल के दौरान कहता है जब तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध के बहाने माजिद को क़स्बे से बाहर करने की बात करता है.

Turup, 72 min / Hindi with EST / Produced by Ektara Collective

Turup, set in Bhopal, the film tells the story of three women, in the backdrop of growing right-wing fundamentalism. As the boundaries of religion, caste, class, gender become clearer and more visible, lives intersect and engage, throwing open opportunities to subvert and transcend these barriers. As people look for answers they also encounter new questions. A chess game which is always being played on a platform by the road becomes the metaphorical background to the playing out of these negotiations.

लव योर नेबर

1952| मौन फिल्म | 8 मिनट | काल्पनिक कथा |

दो पडोसी, एक लड़ाई और उसके अंतहीन प्रभाव। दो पड़ोसियों के बीच हुए एक छोटे से झगडे की कहानी जो शायद इतिहास के हर झगडे की कहानी जैसी है। इस सरल व स्पष्ट फ़िल्म को वियतनाम युद्ध के समय अमेरिका में बैन कर दिया गया था।

Love Your Neighbour
1952| English| 8 Mins
Directed by Norman McLaren

Two neighbors one fight and endless ramifications. A story of a conflict which might just be the story of every conflict in history. A simple film was banned in the USA during the Vietnam war.

दी अदर साईड / जोसेफ़ डेलेऊ / संवाद रहित (बेल्जियम)/ ब्लैक एंड व्हाइट/ शॉर्ट फ़िल्म / 1966/ 10मिनट

यह जो मिली जुली पहचानों वाली नागरिकता है, जिसमें काले अफ्रीकी गोरे यूरोपीय, साँवले एशियाई सब शामिल हैं, जब हम इतनी विविध पहचानों को एक साथ एक ही गली में घिरा हुआ देखते हैं तब यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता कि यह कोई ऐसी गली नहीं है, जिसे हम तथ्यात्मक रूप से किसी देशकाल के संदर्भ में पहचान सकें और अदर साइड से गोलियों की बौछार करने वाला भी किसी एक देश या नस्ल, या संप्रदाय का दुश्मन नहीं है, उसकी गोलियाँ सब को समान रूप से अपना शिकार बनाती है।

फिल्म हमारे सामने यह सवाल रखती है और हमारे विवेक को चुनौती देती है कि हम सन 1961 की उस ‘गली’ को किस रूप में देखें। अगर अस्तित्ववादी नजरिए से देखा जाए तो यह वही दशक था, जब मनुष्य ने पहली बार अपनी निजी स्वतंत्रता के महत्व को समझा था और पहली बार उसे महसूस हुआ था कि व्यवस्था चाहे प्रजातांत्रिक हो या समाजवादी हर तंत्र में कहीं न कहीं एक बंद गली है और हर व्यवस्था में एक अदृश्य नियामक ताकत होती है, जो मनुष्य से उसकी निजी अनुभूतियों और उसकी सहजवृत्तियों को छीनकर उसे तंत्र के अनुकूल बनाने की कोशिश करती है। – कहानी की काया और फिल्म की छाया

The Other Side/De Overkant 1966, 10Min/Jozef Deleu/Black and White/Sound Mono/Belgium

The other side/De Overkent film is about the group of people who try to revolt against a dictatorial regime.

टू प्लस टू / बाबाक अनवरी/ फारसी/ अंग्रेज़ी सब-टाइटल्स/ ब्लैक एंड व्हाइट/ शॉर्ट फ़िल्म/ 2010 /8 मिनट

बाबाक अनवरी की यह शॉर्ट फिल्म हमारे फेस्टिवल की शुरुआती दो फिल्मों में से एक है। यह दुनिया को एकरंग बनाने में जुटी तानाशाही ताकतों के खिलाफ एक बयान है।

Two and Two, 8min/Persian with EST/Babak Anwari/Black and White 

Intro: Two and Two is a 2011 short film directed by Babak Anvari. The film stars a male teacher and twelve students in a grey wall classroom, showing the first lesson which is an expression of 2 + 2 = 5

 

 

– फ़िल्मों का जुड़ना जारी रहेगा 

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी – ‘दास्तान-ए-सेडीशन’ /’Dastan-E-Sedition’

भारत वाचिक परंपरा का देश रहा है. पुराण और पंचतंत्र से लेकर जातक कथाओं तक हमारे यहाँ कहानियां सुनने सुनाने का सिलसिला बहुत पुराना है. यही कारण है कि ईरान में आठवीं सदी में जन्मी दास्तानगोई जब भारत आयी तो उसे हाथों हाथ लिया गया. हमारा मध्यकाल उन कई कई रातों का गवाह है जब दास्तानगो लम्बे लम्बे चलने वाले किस्से को किश्त दर किश्त सुनाते थे और सुनने वाले उस दिलकश अंदाज़ से बंधे हर रात सुनने के लिए इकट्ठे होते थे.

मध्यपूर्व में दास्तानगोई में अमूमन जंग और मोहब्बत यही मुख्य विषय होते थे लेकिन भारत में इसमें दो और आयाम जुड़े – तिलिस्म और अय्यारी. 18 वीं – 19 वीं सदी भारत में दास्तानगोई के उरूज़ का समय है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था कि हमज़ा दास्तान के आठ अध्याय और शराब के सोलह पीपे – इसके बाद ज़िंदगी से कुछ और नहीं चाहिए ! लेकिन समय बीता.

ब्रिटिश शासन में जिन विधाओं को सस्ता और भदेस कहकर हिकारत से नकारा गया, उनमें दास्तानगोई भी थी. मीर बाकर अली इस दास्तानगोई की परंपरा के आख़िरी वारिस थे. 1928 में उनके देहांत के साथ इसका नामो निशान मिट गया.

21 वीं सदी में इसके पुनः जीवित हो उठने की कहानी भी बड़ी रोचक है. ये न होता यदि शम्सुर्रहमान फ़ारूकी न होते और उससे भी पहले मुंशी नवल किशोर न होते. 19 वीं सदी के अंतिम दशकों और 20 वीं सदी के शुरूआती दो दशकों में मुंशी नवल किशोर की प्रेस ने इन दास्तानों को छापा था. कुल 46 जिल्द, लगभग 44 हज़ार पृष्ठ और कोई 2 करोड़ लफ्ज़ किताबों में दर्ज होकर यह इन्तेज़ार कर रहे थे कि कोई आये और इन्हें देखे, अपनी रिवायत को पहचाने. उर्दू के प्रसिद्द आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूकी ने अपने शोध के सिलसिले में कुछ जिल्दों को उल्टा पलटा. वे इनके हैरतअंगेज़ वर्णन से चकित रह गए, फिर उन्होंने इन 46 जिल्दों को ढूँढने का बीड़ा उठाया. हिन्दुस्तान के अलग अलग संग्रहालयों से जुटाकर इन्हें फिर से बटोरा गया और फिर इस कहानी में आये महमूद फ़ारूकी जिन्होंने इन दास्तानों को फिर से पेश करने का इरादा किया.

सन 2005 में दास्तानगोई की पहली प्रस्तुति हुई. प्रस्तुतकर्ता थे महमूद फ़ारूकी और हिमांशु त्यागी. इसे बहुत सराहना मिली और फिर तो सिलसिला चल निकला. महमूद फ़ारूकी और दानिश हुसैन की जोड़ी ने न सिर्फ पुरानी दास्तानों जैसे दास्तान-ए-अमीर हमज़ा को आज के हिसाब से थोडा ढालकर प्रस्तुत किया बल्कि उन्होंने आज के मसाइल को उठाते हुए नई दास्तानें भी लिखीं. बिक्रम बेताल से लेकर विजयदान देथा कृत राजस्थानी लोककथा चौबोली तक सभी कुछ इनका हिस्सा बनीं. विभाजन के दर्द को दास्तान-ए-तकसीम-ए-हिन्द में बयान किया गया तो दास्तान-ए-मोबाइल से लेकर दास्ताने कारपोरेट तक कोई विषय अछूता नहीं रहा. अंकित चड्ढा, हिमांशु बाजपेयी, राणा प्रताप सेंगर, राजेश कुमार नई पीढी के दास्तानगो सामने आये हैं जो अब इस सिलसिले को थमने नहीं देंगे.

‘दास्तान-ए-सेडीशन’, जो हमारे इस फेस्टिवल में प्रस्तुत की जायेगी, 2007 में लिखी गयी थी जब डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में सज़ा हुई थी. बहुत लोकप्रिय हुई इस दास्तान में दास्तानगो, अय्यार अमर ( यानी हीरो ) और जादूगरों के सरदार अफरासियाब ( यानी विलेन ) की कहानी सुनाते हैं. कहानी है कोहिस्तान की और धीरे धीरे इस कोहिस्तान में हमारा वर्तमान भारत घुल मिल जाता है. अमर और अफरासियाब की इस लड़ाई में होता क्या है, जानने के लिए आपको राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार की यह नायाब प्रस्तुति देखने आना होगा.

लेख साभार उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी और हिमांशु पांड्या जी 26 नवम्बर ( दूसरा दिन ) / 3.45 – 4.45 / दास्तान-ए-सीडीशन/ लेखन-निर्देशन – महमूद फ़ारूकी / प्रस्तुति – राणाप्रताप सेंगर और राजेश कुमार/ हिंदुस्तानी / 35 मिनट https://udaipurfilmsociety.wordpress….

Agni Shikha

“It was a decision taken by both of us! Get me a sewing machine, We will both earn something and will together make our ends meet.”

Portraying the life and unfortunate death of Rama Kunwar, this documentary is an effort to understand the social position and dignity of women in our society. It is not uncommon to hear of stories shared in hushed tones, which talk about daughters being slaughtered ruthlessly in order to safeguard family honour.

These whispers mostly remain confined to the four walls, rarely spilling out in the public domain. The practice of whisper campaigns about deeds of honour like the killing of daughters who eloped with someone outside caste or religion served as warnings to the younger generation.

However, the times are changing and we may not hear these whispers as often. Fear of police action and the so-called ‘liberal’ ideas of big cities, it said, have gripped feudal rural societies.

“It only used to happen decades back, when people would immolate their young daughters or girls from the community right in front of everyone if she marries someone of her choice.”

However, the community at Pachalasa Choota, Dungarpur district of Rajasthan did precisely this in the case of Rama. They killed Rama, her crime-eloping and marrying her neighbor Prakash in November 2007.

She was dragged and burnt right in the middle of the village on March 4th, 2016. She was six months pregnant when she was made an example for the rest of the village. Her killing, it was argued, restored the honour of the community and the village.

Do you know what a BMC made disaster is?

It happens every year this time. If you are privileged enough you don’t endure it EVERY YEAR unlike the people in the video. Homes get flooded EVERY YEAR and BMC despite being well aware of the needs of such areas, remain inactive for as long as it can.

People in Mankhurd Transit camp have faced double discrimination this year:

1. They haven’t been given their rightful rehabilitation for years now.

2. Fresh demolitions choked up gutters further and people are forced to stay in these inhumane conditions.

Staying wet and awake through the night, people from such homes show up at work every day. Children and the old fall ill, many succumb to these conditions.

EVERY YEAR the BMC finds an excuse to wash their hands off blaming the “scale of the rains and the bursting city” but the truth is they CAN PREVENT these “disasters” and they don’t.

Credits – Bilal Khan, Ayush Kumar Yadav, Prakash, Anwari, People from Mankhurd Transit Camp, Amit, Saurabh

Dar-Ba-Dar: THE ITINERANTS

This documentary film explores the stories of the street hawkers in a market at Lallubhai Compound, Mumbai. The challenges that are faced in dealing with everyday realities by the hawkers, is the central theme around which the film revolves. In doing so, the film also introduces the space of the market as the central character of the film, which grew out of the rehabilitated population from the slums of the city.

Documentary

A film by AkashBasumatari, ArpitaKatiyar, RajendraJadhav, RadhikaAgarwal, Saurabh Kumar and SujataSarkar

Where The Blue Lotus Blooms

A Home is not merely a physical space; it is a space of belonging- a space of acceptance and dignity. Where the blue lotus blooms is a film made at home with four Transgenders- Joanna, Pradipta, Sree, and Urmi, who are from various social and physical spaces in Mumbai. Cutting through the identity of being a transgender in a world dominated by the cisgenders (the so-called ‘normal’ people) along with the social prejudices that come with it, they speak to each other about how they negotiate the space they call home.

“>Documentary

A film by AnandGautam, Geetha K Wilson, RadhikaAgarwal, Saurabh Kumar & ShreyaKatyayini

 

भीड़

महानगर की कोई शक्ल नही होती वो बस बढ़ता जाता है, कभी तिरपाल संभाले अपनी छतें बंधता तो कभी मज़दूरों से भरी ‘मधुमखी के छत्ते जैसी दिखती’ ईंट-चूने की इमारतें खड़ी करता. हमारे शहर जो पहले महानगर कहलाते है उसके बाद शहर या जो हल्का नाम लगे वो, हमेशा दो आदम के बीच फिक्र की दीवार खड़ी रखते है. कि सुपरवाइजर से मज़दूरी का मोलभाव, ओवरटाइम के घंटे, बिना बैंक जाए पैसा घर कैसे भेजे और भी बहुत

इन्ही दीवारों से बेफिक्र, सईद आज सड़क के किनारे ही अपनी क्रीज़ वाली पेंट पहने कुछ साथी मज़दूरों के साथ ज़मीन पर ही बैठ गया, आज 287 नंबर के स्तंभ के सरियों के जाल का काम पूरा हुआ था. भारी-भरकम काम ने उसे सर से पांव तक निचोड़ दिया था रही-सही कसर बारिश के बाद पैदा हुई उमस ने पूरी कर दी अंततः उससे अपनी शर्ट उतार वही कमर से सटे पेड़ पर लटका दी. 

पास बैठे 3 मज़दूरों में चाय और ब्रेड के पैसे इकठ्ठा हो रहे थे और लगातार इस पर बहस हो रही थी कि ये सब समान जाकर कौन लाये? बहस को अनदेखा करते हुए सईद ने 20 रुपये उनमें से एक के हाथ में थमा दिए और फिर से सड़क की तरफ देखने लगा. पैसे तय रकम से कुछ ज्यादा थे इसलिए कोई कुछ न बोला और फिर बहस में लग गये.

सोचते हुए कि,

सब ठीक ही चल रहा है मेट्रो के नए निर्माणधीन प्रोजेक्ट में सरिया बांधने की शुरूआत तो हुई भला हो आई. टी.आई. की डिग्री का जो 10 साल बाद कोई काम तो आई, पेट भर जाए और चाहिये भी क्या? आज के काम के बाद सच मे उसकी पसलियां चल रही थी शायद एक गिलास दूध उसके दर्द को भगा देता लेकिन आज दूध की जगह उसे गाड़ियों की हेडलाइटों से सीधी पड़ती दूधिया रोशनी ही नसीब थी. 

नोट – कहानी जारी रहेगी.